अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में लौटे पांच साल पूरे हो गए हैं। 15 अगस्त 2021 को काबुल पर कब्जे के बाद तालिबान ने देश में अपना शासन स्थापित किया था। पांच साल बाद तालिबान इसे स्थिरता और विदेशी कब्जे के अंत की उपलब्धि बता रहा है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार स्थिति को लेकर लगातार गंभीर चेतावनी दे रहा है।
संयुक्त राष्ट्र के अफगानिस्तान मानवाधिकार विशेष दूत रिचर्ड बेनेट ने कहा है कि देश गंभीर मानवाधिकार संकट से गुजर रहा है। उनकी रिपोर्टों में तालिबान की नीतियों के कारण महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों में लगातार गिरावट, सार्वजनिक दंड, मनमानी गिरफ्तारियों और नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंधों का उल्लेख किया गया है।
सबसे बड़ा संकट महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा को लेकर है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार करीब 24 लाख अफगान लड़कियां माध्यमिक शिक्षा से बाहर हैं। अफगानिस्तान दुनिया का एकमात्र देश है जहां लड़कियों को माध्यमिक और उच्च शिक्षा से औपचारिक रूप से रोका गया है। महिलाओं के काम करने और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी पर भी कड़े प्रतिबंध जारी हैं।
दूसरी ओर तालिबान का दावा है कि उसके शासन में सुरक्षा बेहतर हुई है और दशकों से चले आ रहे संघर्ष में कमी आई है। लेकिन आर्थिक संकट, बेरोजगारी, मानवीय सहायता में कमी और महिलाओं पर प्रतिबंधों ने देश के भविष्य को लेकर सवाल बढ़ा दिए हैं।
**पांच साल बाद असली सवाल यही है—क्या सिर्फ सत्ता पर नियंत्रण को स्थिर शासन माना जा सकता है, जब आधी आबादी के अधिकार ही सीमित कर दिए जाएं?**

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