तिरपाल के नीचे भविष्य गढ़ रहे 500 बच्चे!

 

श्योपुर के ढोढर में सरकारी स्कूल की बदहाली ने खोली शिक्षा व्यवस्था की पोल, भवन है लेकिन कक्षाएं कम

श्योपुर। मध्यप्रदेश सरकार सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा, पर्याप्त सुविधाओं और बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने के दावे करती है, लेकिन श्योपुर जिले के ढोढर कस्बे की तस्वीर इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यहां शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में करीब 500 छात्र-छात्राएं पढ़ रहे हैं, लेकिन विद्यार्थियों की संख्या के अनुपात में पर्याप्त कक्ष उपलब्ध नहीं हैं। नतीजा यह है कि बच्चों को कक्षाओं के बजाय तिरपाल और छप्पर के नीचे बनी अस्थायी झोपड़ी में बैठाकर पढ़ाना पड़ रहा है।

भवन मौजूद, फिर भी बच्चों के सिर पर तिरपाल

ढोढर श्योपुर जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर है। यहां संचालित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में बड़ी संख्या में विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। विद्यालय के पास भवन तो है, लेकिन विद्यार्थियों की संख्या के हिसाब से कक्षों की कमी बनी हुई है।

ऐसे में शिक्षकों ने वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर परिसर में अस्थायी छप्पर तैयार कराया है। यही छप्पर अब कई विद्यार्थियों की कक्षा बन गया है।

यानी जिस उम्र में बच्चों को सुरक्षित, व्यवस्थित और सुविधाजनक कक्षा-कक्ष मिलना चाहिए, उस उम्र में वे तिरपाल की छत के नीचे बैठकर भविष्य की पढ़ाई करने को मजबूर हैं।

बारिश में पढ़ाई या मौसम से जंग?

सबसे बड़ा सवाल बारिश के मौसम को लेकर है। तिरपाल और अस्थायी छप्पर आखिर कितनी देर तक बच्चों को बारिश से बचा सकते हैं? तेज हवा और लगातार बारिश के दौरान पढ़ाई किस तरह संचालित होती होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

यह केवल भवन की कमी का मामला नहीं है। यह बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा के वातावरण और सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे से जुड़ा सवाल है।

500 बच्चों के लिए कितने कमरे?

इस मामले में शिक्षा विभाग को सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए कि—

विद्यालय में कुल कितने विद्यार्थी दर्ज हैं?

विद्यालय में कुल कितने कक्षा-कक्ष उपलब्ध हैं?

कितने कक्षा-कक्ष वर्तमान में उपयोग योग्य हैं?

विद्यार्थियों की संख्या के अनुपात में अतिरिक्त कमरों की आवश्यकता कितनी है?

विद्यालय के लिए अतिरिक्त भवन या कक्षों का प्रस्ताव कब भेजा गया?

यदि प्रस्ताव भेजा गया तो उस पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?

अस्थायी छप्पर बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?

बारिश के दौरान विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था है?

श्योपुर जिला प्रशासन की वेबसाइट पर जिले में कुल 1,235 विद्यालय दर्ज हैं और शिक्षा विभाग की जिम्मेदारियां भी स्पष्ट रूप से दर्ज हैं। ऐसे में ढोढर जैसे विद्यालय में बुनियादी कक्षों की कमी का समाधान स्थानीय स्तर से लेकर जिला स्तर तक जवाबदेही का विषय बनता है।

सवाल सरकार से—दावे स्मार्ट स्कूल के, कक्षा झोपड़ी में क्यों?

सरकार शिक्षा के स्तर में सुधार और बच्चों को बेहतर सुविधाएं देने की बात करती है। लेकिन यदि एक सरकारी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में सैकड़ों विद्यार्थी पढ़ रहे हों और उन्हें बैठाने के लिए तिरपाल का सहारा लेना पड़े, तो सवाल केवल स्कूल प्रबंधन पर नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर उठता है।

सरकार यदि वास्तव में सरकारी स्कूलों को मजबूत बनाना चाहती है तो उसे केवल घोषणाओं और योजनाओं से आगे बढ़कर यह देखना होगा कि जमीन पर बच्चे किन परिस्थितियों में पढ़ रहे हैं।

ढोढर की यह झोपड़ी केवल एक अस्थायी कक्षा नहीं है—यह सरकारी शिक्षा व्यवस्था के उन दावों पर बड़ा सवाल है, जिनका जवाब अब शिक्षा विभाग और सरकार को देना चाहिए।

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