नई दिल्ली। भारतीय सेना में नेपाली नागरिकों का गोरखा सैनिक के रूप में शामिल होना सामान्य नागरिकता कानून से अलग एक ऐतिहासिक व्यवस्था के तहत हुआ है। इसकी जड़ें ब्रिटिश काल तक जाती हैं। 1816 के एंग्लो-नेपाल युद्ध के बाद ब्रिटिश भारतीय सेना में गोरखाओं की भर्ती शुरू हुई और समय के साथ यह एक स्थापित सैन्य परंपरा बन गई।
भारत की आजादी के बाद 9 नवंबर 1947 को भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ। इसी समझौते के तहत तत्कालीन 10 गोरखा रेजिमेंटों में से छह भारत और चार ब्रिटेन की सेना में चली गईं। नेपाली नागरिकों को भारतीय सेना में गोरखा सैनिक के तौर पर सेवा जारी रखने का विशेष आधार इसी व्यवस्था से मिला।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समझौते की व्यवस्था में गोरखा सैनिक को नेपाली नागरिक के रूप में भर्ती किए जाने, सेवा करने और सेवानिवृत्ति के बाद नेपाल में बसने की बात कही गई थी। यानी भारतीय सेना में भर्ती होना अपने-आप भारतीय नागरिक बन जाना नहीं है।
गोरखा सैनिक भारतीय सेना का हिस्सा होते हैं, भाड़े के सैनिक नहीं। उन्हें सेना की कमान, अनुशासन और सेवा नियमों के तहत ही काम करना होता है। भारतीय सेना में आज सात गोरखा रेजिमेंट हैं।
हालांकि अब अग्निपथ योजना के कारण नेपाली गोरखाओं की नई भर्ती का सवाल अलग विवाद बन गया है। नेपाल की ओर से चार साल की संविदा वाली व्यवस्था को 1947 की पुरानी भर्ती व्यवस्था से अलग माना गया है और इसी कारण नई भर्ती लंबे समय से अटकी हुई है।
यानी गोरखा सैनिक भारतीय सेना में सेवा करते हैं, लेकिन उनकी भर्ती के लिए भारतीय नागरिकता अनिवार्य होने की सामान्य शर्त पर 1947 का विशेष ऐतिहासिक समझौता लागू होता है।

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