दिल्ली जल बोर्ड के 1943 करोड़ रुपये के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट टेंडर में कथित गड़बड़ियों ने सरकारी खरीद व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार, चार टेंडरों की तकनीकी शर्तों में इस तरह बदलाव किए गए कि प्रतिस्पर्धा सीमित हो गई और चुनिंदा कंपनियों के लिए रास्ता आसान हुआ।
प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार, 2022 में दस सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के उन्नयन और विस्तार के लिए चार टेंडर जारी हुए थे। इनकी शुरुआती अनुमानित लागत करीब 1546 करोड़ रुपये थी, जिसे प्रक्रिया के दौरान बढ़ाकर 1943 करोड़ रुपये कर दिया गया। एजेंसी का आरोप है कि टेंडर में आईएफएएस तकनीक और फिक्स्ड मीडिया जैसी शर्तों ने भागीदारी का दायरा बेहद सीमित कर दिया।
जांच में यह भी सामने आया कि चारों टेंडरों में केवल तीन संयुक्त उपक्रम कंपनियों ने हिस्सा लिया और तीनों को काम मिला। ईडी के मुताबिक, इन कंपनियों ने समान अनुभव प्रमाणपत्र का इस्तेमाल किया, जिसे पर्याप्त सत्यापन के बिना स्वीकार किया गया। बाद में चारों परियोजनाओं का काम हैदराबाद की यूरोटेक एनवायरमेंटल प्राइवेट लिमिटेड को उपठेके पर दिए जाने की बात जांच में सामने आई।
मामला यहीं नहीं रुका। एजेंसियों ने कथित रिश्वत और अनुचित लाभ की रकम का वित्तीय रास्ता भी खंगाला है। ईडी ने 17.70 करोड़ रुपये की कथित अपराध आय की कड़ी जोड़ी है और करीब 15.36 करोड़ रुपये की संपत्तियां अस्थायी रूप से कुर्क किए जाने की जानकारी दी है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—जनता के पैसे से होने वाले इतने बड़े टेंडर में ऐसी शर्तें आखिर किसके हित में तैयार हुईं और सरकारी खजाने पर पड़े अतिरिक्त बोझ की जवाबदेही किसकी होगी?

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