आदिवासी गांवों में कुपोषण की दोहरी मार; छह महीने से पोषण आहार नहीं मिलने का ग्रामीणों का आरोप, प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
बालाघाट के आदिवासी अंचल से सामने आ रही बच्चों की मौतों की खबर ने मध्य प्रदेश की सरकारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का दावा है कि पिछले दो महीनों में मछुरदा, कोरका, मातला, कोंडेकसा, अडोरी और बोंदारी जैसे गांवों में 19 बच्चों की मौत हो चुकी है। वहीं प्रशासनिक आंकड़ा इन मौतों की संख्या 8 बता रहा है। यही अंतर अब सबसे बड़ा सवाल बन गया है—आखिर सच कितनी मौतों का है?
स्थानीय आदिवासी परिवारों का आरोप है कि इन इलाकों में करीब छह महीने से पोषण आहार का नियमित वितरण नहीं हुआ। यदि यह आरोप सही है तो मामला केवल कुपोषण का नहीं, बल्कि बच्चों तक जरूरी पोषण पहुंचाने वाली सरकारी व्यवस्था की गंभीर विफलता का भी है।
इन गांवों की स्थिति इसलिए और चुनौतीपूर्ण है क्योंकि क्षेत्र लंबे समय से पिछड़ेपन और नक्सल प्रभाव जैसी समस्याओं से जूझता रहा है। स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच, समय पर उपचार, पोषण और जागरूकता की कमी बच्चों के लिए खतरा बढ़ा सकती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ग्रामीण 19 बच्चों की मौत की बात कह रहे हैं और सरकारी रिकॉर्ड में केवल 8 मौतें दर्ज हैं, तो बाकी मामलों की जांच किस स्तर पर हुई? क्या प्रत्येक मौत का चिकित्सकीय परीक्षण और दस्तावेजी सत्यापन हुआ? क्या मृत बच्चों के परिवारों से प्रशासन ने संपर्क किया?
विपक्ष ने इन मौतों को लेकर मोहन यादव सरकार और संबंधित विभागों पर लापरवाही के आरोप लगाए हैं। लेकिन राजनीतिक आरोपों से आगे अब सरकार को गांव-गांव जाकर वास्तविक स्थिति सामने रखनी होगी।
बच्चों की मौत किसी आंकड़े की पंक्ति नहीं है। हर संख्या के पीछे एक परिवार, एक मां और एक अधूरा बचपन है। सरकार को बताना होगा—बालाघाट में आखिर कितने बच्चों की जान गई और क्यों?

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