भोपाल। नर्सिंग शिक्षा व्यवस्था को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश समेत तीन राज्यों में पढ़ रहे हजारों विद्यार्थियों के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार देशभर के 1,484 नर्सिंग कॉलेज भारतीय नर्सिंग परिषद की मान्यता के दायरे में नहीं हैं। इनमें मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के 357 संस्थान बताए गए हैं।
स्क्रीनशॉट में प्रकाशित विवरण के मुताबिक मध्य प्रदेश के 131, छत्तीसगढ़ के 42 और राजस्थान के 184 नर्सिंग कॉलेज ऐसे बताए गए हैं, जिनके पास भारतीय नर्सिंग परिषद की मान्यता नहीं है। हालांकि इन आंकड़ों की संस्थानवार पुष्टि संबंधित राज्य परिषद और भारतीय नर्सिंग परिषद की ताजा सूची से करना जरूरी है।
राज्य की मान्यता और राष्ट्रीय मान्यता में फर्क
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है। किसी संस्थान का राज्य नर्सिंग परिषद से मान्यता प्राप्त होना और भारतीय नर्सिंग परिषद की उपयुक्तता अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। भारतीय नर्सिंग परिषद अपनी वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से राज्य परिषद से मान्यता प्राप्त संस्थानों का निरीक्षण कर उनकी उपयुक्तता की सूची जारी करती है।
भारतीय नर्सिंग परिषद अधिनियम, 1947 में संस्थानों के निरीक्षण और मान्यता वापस लेने की व्यवस्था धारा 13 और 14 के तहत है।
सबसे बड़ा सवाल—फीस किसने ली और जिम्मेदारी किसकी?
यदि किसी कॉलेज ने राज्य स्तर की अनुमति के आधार पर विद्यार्थियों को प्रवेश दिया, फीस ली और वर्षों तक पढ़ाई कराई, लेकिन बाद में उसकी राष्ट्रीय स्तर की मान्यता को लेकर सवाल खड़े हुए, तो सबसे बड़ा प्रश्न विद्यार्थियों पर नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था पर उठता है।
छात्रों ने पहले ही परीक्षा, लंबित परिणाम, डिग्री और छात्रवृत्ति की समस्याओं को लेकर भोपाल में प्रदर्शन किया है। जुलाई में भी नर्सिंग छात्रों की समस्याओं को लेकर नीलम पार्क में प्रदर्शन और 13 सूत्रीय मांगपत्र सौंपे जाने की रिपोर्ट सामने आई थी।
भारतीय नर्सिंग परिषद ने नर्सिंग कार्यक्रमों के लिए न्यूनतम आवश्यकताओं में छात्र-शिक्षक अनुपात, बुनियादी ढांचे, प्रयोगशालाओं, छात्रावास और नैदानिक सुविधाओं जैसे मानक निर्धारित किए हैं।
अब असली जांच यह होनी चाहिए कि इन संस्थानों को राज्य स्तर पर अनुमति कब मिली, प्रवेश किस आधार पर हुए, कितने विद्यार्थियों ने पढ़ाई की, फीस कितनी वसूली गई और भारतीय नर्सिंग परिषद की उपयुक्तता क्यों नहीं मिली।
सवाल सिर्फ 357 कॉलेजों का नहीं है—सवाल उन हजारों विद्यार्थियों के भविष्य का है, जिन्होंने व्यवस्था पर भरोसा करके नर्सिंग को अपना करियर चुना।

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