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संसद चली कम, हंगामा ज्यादा; 133 घंटे का लक्ष्य, लोकसभा की उत्पादकता सिर्फ 16 प्रतिशत

नई दिल्ली। संसद का मानसून सत्र इस बार कामकाज के लिहाज से बेहद निराशाजनक रहा। लोकसभा और राज्यसभा के लिए करीब 133-133 घंटे कामकाज का समय निर्धारित था, लेकिन विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच लगातार टकराव, नारेबाजी और हंगामे के कारण दोनों सदन तय समय का बड़ा हिस्सा गंवा बैठे।



लोकसभा की उत्पादकता महज 16 प्रतिशत रही, जबकि राज्यसभा की उत्पादकता 39.17 प्रतिशत दर्ज की गई। यानी जिस समय का इस्तेमाल देश के कानून, नीतियों और जनहित के मुद्दों पर बहस के लिए होना चाहिए था, उसका बड़ा हिस्सा व्यवधान की भेंट चढ़ गया।


सवाल सिर्फ हंगामे का नहीं, जवाबदेही का भी


संसद में विपक्ष का विरोध लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है और सरकार से सवाल पूछना उसका अधिकार। लेकिन जब विरोध लगातार कार्यवाही रोकने का माध्यम बन जाए तो सवाल उठता है कि जनता के पैसे और लोकतांत्रिक व्यवस्था के इस सर्वोच्च मंच का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है।


दूसरी ओर, सत्ता पक्ष की भी जिम्मेदारी है कि वह विपक्ष को पर्याप्त चर्चा का अवसर दे और महत्वपूर्ण विधेयकों को केवल संख्याबल के भरोसे पारित कराने के बजाय व्यापक बहस सुनिश्चित करे।


जनता के मुद्दे पीछे छूटे


महंगाई, रोजगार, किसानों की समस्याएं, राष्ट्रीय सुरक्षा, राज्यों के आर्थिक हित और विभिन्न नीतिगत फैसलों जैसे मुद्दों पर संसद में गंभीर और विस्तृत चर्चा लोकतंत्र की मूल आवश्यकता है। लेकिन लगातार व्यवधान ने इन मुद्दों पर सार्थक बहस की गुंजाइश सीमित कर दी।


संसद केवल कानून बनाने की जगह नहीं है। यह सरकार से सवाल पूछने, नीतियों की समीक्षा करने और जनता की आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर रखने का मंच भी है। जब सदन कम चलता है तो नुकसान केवल सरकार या विपक्ष का नहीं, बल्कि सीधे जनता का होता है।


हर सत्र के बाद वही सवाल


हर बार संसद के हंगामे के बाद उत्पादकता के आंकड़े सामने आते हैं और राजनीतिक दल एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन स्थायी समाधान अब भी दिखाई नहीं देता।


जरूरत इस बात की है कि विरोध का अधिकार भी सुरक्षित रहे और संसद का कामकाज भी। राजनीतिक मतभेद सदन के भीतर बहस में बदलें, कार्यवाही बाधित करने में नहीं।


आखिर 133 घंटे के लिए तय संसद अगर उसका छोटा-सा हिस्सा ही काम कर पाए, तो सवाल केवल यह नहीं कि सदन क्यों नहीं चला—सवाल यह भी है कि जनता के प्रतिनिधियों को दिए गए समय और अधिकार का हिसाब कौन देगा?

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