आयाम बजाज मुंबई।
रमेश म्हात्रे पर मुंबई महानगर क्षेत्र के कल्याण-डोंबिवली स्थित शास्त्रीनगर अस्पताल में डॉक्टरों, नर्सों और स्वास्थ्यकर्मियों से मारपीट तथा धमकी देने के आरोप लगे हैं। घटना का वीडियो सामने आने के बाद चिकित्सा समुदाय में भारी आक्रोश है। विरोधस्वरूप डॉक्टरों और कर्मचारियों ने नियमित सेवाएं बंद कर दीं, जबकि आपातकालीन सेवाएं जारी रहीं। पुलिस ने मामले में प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
बताया जा रहा है कि विवाद एक गर्भवती महिला को दूसरे अस्पताल भेजने के चिकित्सकीय निर्णय को लेकर शुरू हुआ। अस्पताल प्रशासन के अनुसार नवजात शिशु के लिए आवश्यक विशेष नवजात देखभाल इकाई (एनआईसीयू) में स्थान उपलब्ध नहीं था, इसलिए रेफर करने का निर्णय लिया गया। इसी दौरान कथित रूप से अस्पताल परिसर में डॉक्टरों और नर्सों के साथ मारपीट हुई।
यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि देश के सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती है। पिछले कुछ वर्षों में इलाज में देरी, मरीज की मृत्यु या संसाधनों की कमी को लेकर डॉक्टरों पर हमलों की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि चिकित्सा संबंधी निर्णय हिंसा या राजनीतिक दबाव से नहीं, बल्कि चिकित्सकीय आवश्यकता के आधार पर लिए जाते हैं।
डॉक्टर संगठनों ने आरोपियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई, अस्पतालों में प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए सुरक्षित कार्य वातावरण की मांग की है। उनका कहना है कि यदि अस्पताल ही भय का केंद्र बन जाएंगे तो इसका सबसे बड़ा नुकसान आम मरीजों को होगा, क्योंकि विरोध और असुरक्षा के कारण स्वास्थ्य सेवाएं बाधित होती हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों से कानून का पालन कराने की अपेक्षा की जाती है, न कि कानून अपने हाथ में लेने की। इस मामले में अंतिम निष्कर्ष पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा, लेकिन यह घटना स्पष्ट संकेत देती है कि अस्पतालों में चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित का भी महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुका है।

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