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पुराने उद्योगों पर ताले, नए निवेश के दावे... सवालों के घेरे में रोजगार

 


शिवसेना (यूबीटी) का सरकार पर हमला, एमएसएमई बंद होने के आंकड़ों को लेकर उठाए गंभीर सवाल


परीक्षित गुप्ता, मुंबई


देश में रोजगार और औद्योगिक विकास को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। शिवसेना (यूबीटी) ने अपने मुखपत्र सामना के संपादकीय में केंद्र सरकार पर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र की अनदेखी का आरोप लगाया है। पार्टी ने लोकसभा में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि वर्ष 2024 से 2026 के बीच देशभर में 1,21,805 एमएसएमई इकाइयों का संचालन बंद हो गया, जिससे लाखों लोगों के रोजगार प्रभावित हुए।



संपादकीय में कहा गया है कि सरकार एक ओर नए उद्योगों और निवेश के बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर पुराने उद्योग लगातार बंद हो रहे हैं। पार्टी का आरोप है कि यदि बंद हो रही इकाइयों के पुनर्जीवन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो रोजगार संकट और गहरा सकता है।


शिवसेना (यूबीटी) के अनुसार, सबसे अधिक असर महाराष्ट्र में देखने को मिला, जहां तीन वर्षों में 28,764 एमएसएमई इकाइयां बंद हुईं। इसके बाद तमिलनाडु (14,176), गुजरात (11,150) और राजस्थान (9,881) का स्थान है। पार्टी का दावा है कि ये आंकड़े रोजगार सृजन और औद्योगिक विकास के सरकारी दावों से मेल नहीं खाते।


संपादकीय में यह भी कहा गया कि पिछले दस वर्षों में सरकार ने स्टार्टअप और एमएसएमई क्षेत्र के लिए ₹35 लाख करोड़ से अधिक का ऋण उपलब्ध कराने का दावा किया है, लेकिन बढ़ती उत्पादन लागत, बाजार की चुनौतियों और प्रशासनिक बाधाओं के कारण अनेक इकाइयां टिक नहीं सकीं।


महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए शिवसेना (यूबीटी) ने कहा कि राज्य में एक ओर 75 लाख से अधिक नए उद्यम पंजीकृत हुए, वहीं दूसरी ओर 28 हजार से अधिक एमएसएमई इकाइयां बंद हो गईं। पार्टी का आरोप है कि बीमार उद्योगों के पुनर्वास के लिए प्रभावी नीति के अभाव में बैंकों का एनपीए बढ़ रहा है और हजारों युवाओं का रोजगार खत्म हो रहा है।


सरकार का पक्ष भी महत्वपूर्ण


केंद्र सरकार का कहना रहा है कि एमएसएमई क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए ऋण गारंटी, आपातकालीन ऋण सहायता, डिजिटल पंजीकरण, सरकारी खरीद में प्राथमिकता और विभिन्न प्रोत्साहन योजनाएं संचालित की जा रही हैं। सरकार का यह भी दावा है कि बड़ी संख्या में नए उद्यम स्थापित हुए हैं और रोजगार के अवसर बढ़े हैं।


अब बहस इस बात पर केंद्रित है कि क्या नए उद्योगों की संख्या बंद हो रही इकाइयों से पैदा हुए नुकसान की भरपाई कर पा रही है, या एमएसएमई क्षेत्र को अतिरिक्त नीति समर्थन की आवश्यकता है? यही सवाल राजनीतिक और आर्थिक विमर्श के केंद्र में है।

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