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दतिया का उपचुनाव: असली लड़ाई विपक्ष से नहीं, अपनों की नाराज़गी से

 


प्रणव बजाज


दतिया विधानसभा उपचुनाव अब केवल एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है। यह भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस—दोनों के लिए संगठन, नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के विश्वास की परीक्षा बन चुका है। चुनाव में मतदान से पहले जो माहौल दिखाई दे रहा है, उसमें सबसे बड़ी चर्चा विकास, योजनाओं या घोषणाओं की नहीं, बल्कि दलों के भीतर की खींचतान और असंतोष की है।



भारतीय जनता पार्टी ने पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आयुष्मान तिवारी को उम्मीदवार बनाया। यह निर्णय संगठन का अधिकार है, लेकिन राजनीति में केवल निर्णय लेना पर्याप्त नहीं होता, उसे कार्यकर्ताओं और समर्थकों के मन तक भी पहुंचाना पड़ता है। दतिया में चर्चा इस बात की है कि क्या वर्षों से नरोत्तम मिश्रा के साथ काम करने वाला कार्यकर्ता पूरी ताकत से नए उम्मीदवार के साथ खड़ा होगा? यही प्रश्न भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।


मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव लगातार चुनाव प्रचार कर रहे हैं और संगठन के वरिष्ठ नेता भी मैदान में हैं। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल सहित पूरा संगठन जीत सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहा है। लेकिन चुनावी गणित केवल मंचों की भीड़ से तय नहीं होता। अंतिम निर्णय मतदान केंद्र पर मतदाता करता है। यदि संगठन के भीतर किसी स्तर पर असंतोष बना रहता है, तो उसका असर परिणामों पर पड़ सकता है।


दूसरी ओर कांग्रेस भी पूरी तरह निश्चिंत नहीं है। उसके सामने भी गुटबाजी और संगठनात्मक चुनौतियां हैं। कांग्रेस की उम्मीद इस बात पर टिकी दिखाई देती है कि यदि भाजपा का आंतरिक असंतोष मतदान तक बना रहा, तो उसका राजनीतिक लाभ उसे मिल सकता है। लेकिन केवल प्रतिद्वंद्वी की कमजोरी किसी चुनाव में स्थायी जीत की गारंटी नहीं होती। जनता सकारात्मक विकल्प भी तलाशती है।


दतिया की राजनीति में राजेंद्र भारती, अवधेश नायक, रामनिवास सिंह, सीताराम कुशवाह, भारत कुशवाह, सिद्धार्थ कुशवाह और अन्य स्थानीय नेताओं की सक्रियता भी चर्चा का विषय है। यह उपचुनाव बता देगा कि स्थानीय नेतृत्व का प्रभाव कितना है और केंद्रीय तथा प्रदेश नेतृत्व की अपील कितनी निर्णायक साबित होती है।


इस चुनाव से सबसे बड़ा संदेश राजनीतिक दलों के लिए यही है कि कार्यकर्ता केवल चुनाव के समय याद करने की वस्तु नहीं है। जब समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा होती है, तो उसकी नाराजगी का असर चुनावी परिणामों में दिखाई देता है। लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत जनता है, लेकिन जनता तक पहुंचने का माध्यम कार्यकर्ता ही होता है।


मतदाता भी इस बार केवल वादों पर नहीं, बल्कि नेतृत्व की विश्वसनीयता, संगठन की एकजुटता और उम्मीदवार की स्वीकार्यता पर निर्णय करेगा। यदि किसी दल में आंतरिक मतभेद हैं, तो उन्हें समय रहते दूर करना उसी दल की जिम्मेदारी है। चुनाव जीतने के लिए केवल विपक्ष की आलोचना पर्याप्त नहीं होती; अपने घर को भी व्यवस्थित रखना पड़ता है।


दतिया का उपचुनाव अंततः यह तय करेगा कि राजनीतिक दलों में अनुशासन अधिक प्रभावी है या व्यक्तिगत नाराजगी। परिणाम चाहे जिसके पक्ष में आए, यह चुनाव मध्यप्रदेश की राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश छोड़ जाएगा—सत्ता का सबसे बड़ा विरोधी कई बार विपक्ष नहीं, बल्कि संगठन के भीतर का असंतोष होता है।


— बौद्धिक प्रतिकार संपादकीय

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