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चढ़ावे पर शोर, युद्ध पर मौन!

प्रणव बजाज ( व्यंग )



कभी-कभी लगता है कि हमारे देश की राजनीति और मीडिया का कैमरा भी बड़ा चयनात्मक हो गया है। जहां सनसनी मिले, वहीं फोकस; जहां तथ्य हों, वहां सन्नाटा।


अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़े आरोप सामने आए नहीं कि कुछ नेताओं और कुछ माध्यमों ने ऐसा माहौल बना दिया, मानो पूरे मंदिर की पवित्रता ही कठघरे में खड़ी हो गई हो। किसी भी तरह की अनियमितता की जांच होनी चाहिए, दोषी हो तो कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी संस्था या व्यक्ति की कथित गलती के आधार पर करोड़ों लोगों की आस्था को कटघरे में खड़ा करना उचित है?


दूसरी ओर दुनिया का नक्शा देखिए। पश्चिम एशिया में युद्ध, मिसाइलें, बम, तबाही और सत्ता की लड़ाई का सिलसिला जारी है। जिन देशों को कभी एक ही धार्मिक पहचान के आधार पर एकजुट बताया जाता था, वहीं आज राजनीतिक हित, सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव के लिए एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई देते हैं। वहां रिश्तों का आधार आस्था नहीं, रणनीति है; दोस्ती नहीं, हित हैं।


लेकिन भारत में कुछ लोगों की चिंता का केंद्र युद्ध नहीं, बल्कि राम मंदिर की प्रतिष्ठा बन जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें हर घटना में मंदिर को विवाद का विषय बनाने का अवसर चाहिए। यदि कहीं चोरी होती है, तो दोष चोर का होना चाहिए, मंदिर का नहीं। यदि कहीं भ्रष्टाचार होता है, तो जिम्मेदार व्यक्ति पर कार्रवाई होनी चाहिए, श्रद्धा पर नहीं।


राम मंदिर केवल पत्थरों से बनी इमारत नहीं है। यह उन करोड़ों लोगों की भावनाओं का प्रतीक है जिन्होंने सदियों तक इस स्थान को अपनी आस्था का केंद्र माना। किसी भी धार्मिक स्थल की गरिमा का सम्मान होना चाहिए, चाहे वह मंदिर हो, मस्जिद, गुरुद्वारा या गिरजाघर।


व्यंग्य यही है कि कुछ लोग चढ़ावे की कथित गड़बड़ी को पूरी सनातन परंपरा का प्रमाणपत्र बना देते हैं, लेकिन दुनिया में चल रहे बड़े संघर्षों पर उनकी आवाज उतनी मुखर नहीं होती। मानो आस्था पर प्रहार करना आसान हो और वैश्विक सच्चाइयों पर बोलना कठिन।


लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन सवालों का लक्ष्य न्याय होना चाहिए, पूर्वाग्रह नहीं। जांच का उद्देश्य सच होना चाहिए, सनसनी नहीं। और सबसे बढ़कर, किसी भी अपराध की जिम्मेदारी अपराधी की होनी चाहिए, न कि करोड़ों लोगों की आस्था की।


व्यंग्य का निष्कर्ष बस इतना है—चोर को चोर कहिए, लेकिन मंदिर को कठघरे में मत खड़ा कीजिए। सवाल उठाइए, लेकिन आस्था का उपहास मत बनाइए। और यदि दुनिया को आईना दिखाना है, तो आईना हर दिशा में बराबरी से घुमाइए।

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