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पेपर लीक कानून पास, लेकिन संसद में 'बोल बम' फूटे

 


पेपर से ज्यादा बयानों पर बवाल, 'भाई-बहन' की जुबान सत्ता के निशाने पर

प्रणव बजाज


पेपर लीक रोकने के लिए केंद्र सरकार का परीक्षा सुधार विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हो गया। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन जाएगा। नए कानून के तहत पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के मामलों की जांच तीन माह और मुकदमे का निपटारा पांच माह के भीतर करने का लक्ष्य रखा गया है।



लेकिन जिस दिन देश को परीक्षा सुधार कानून पर गंभीर बहस की उम्मीद थी, उसी दिन संसद में राजनीतिक घमासान बयानों पर सिमट गया। विपक्ष के तेवर और सत्ता पक्ष के पलटवार ने पूरे घटनाक्रम को बयानबाजी की लड़ाई में बदल दिया।


कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी की 'गोमूत्र' संबंधी टिप्पणी ने नया विवाद खड़ा कर दिया। देशभर के 215 कुलपतियों, शिक्षाविदों और वरिष्ठ अकादमिकों ने खुला पत्र जारी कर आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामकोटी पर की गई टिप्पणी को वैज्ञानिक समुदाय का अपमान बताते हुए सार्वजनिक माफी की मांग की। उनका कहना है कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन वैज्ञानिकों और शिक्षा जगत का उपहास लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है।


उधर, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी भाजपा के निशाने पर आ गए। गृहमंत्री अमित शाह पर बिना प्रमाण गंभीर आरोप लगाने तथा सदन में "अंधभक्त" और "इडियट्स" जैसे शब्दों के इस्तेमाल को लेकर भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया है। सत्ता पक्ष का आरोप है कि सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाई गई है।


इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छात्रों के नाम वीडियो संदेश जारी कर परीक्षा सुधार कानून को युवाओं के भविष्य की दिशा में बड़ा कदम बताया। दूसरी ओर छात्र आंदोलन से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक टकराव लगातार तेज बना हुआ है।


दिल्ली में छात्र आंदोलन के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों ने भी प्रेस वार्ता कर अपना पक्ष रखा। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंसा में पुलिसकर्मियों की जान जोखिम में डाली गई और पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की मांग की।


बौद्धिक प्रतिकार की टिप्पणी


कानून पास हो गया, लेकिन संसद फिर बयानों में फेल हो गई।


देश के करोड़ों छात्रों को परीक्षा सुधार, रोजगार और शिक्षा व्यवस्था पर जवाब चाहिए था, लेकिन सत्ता और विपक्ष एक-दूसरे के शब्दों का हिसाब लगाने में उलझे रहे। संसद में कानून कम और कटाक्ष अधिक गूंजे। लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, पर जब बहस का केंद्र समाधान नहीं बल्कि सनसनी बन जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान जनता के भरोसे का होता है।

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