क्या जनता सिर्फ टैक्स दे और अफसर विरासत में बनते रहें करोड़पति?
बौद्धिक प्रतिकार विशेष खोजी रिपोर्ट
भोपाल।
मध्य प्रदेश में सरकारी अफसरों की संपत्तियों के खुलासे ने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन अधिकारियों को जनता की जमीन, राजस्व, नामांतरण और प्रशासनिक फैसलों की जिम्मेदारी सौंपी गई है, उन्हीं में से कई अधिकारियों की संपत्ति का बड़ा हिस्सा ससुराल, चाचा, दादा, नाना और अन्य रिश्तेदारों से मिले उपहारों तथा विरासत के रूप में सामने आया है।
कागजों में सब कुछ वैध है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर इतने "भाग्यशाली" अफसर ही क्यों हैं जिन पर करोड़ों की संपत्ति की बरसात होती रहती है?
किसे क्या मिला?
नीलेश कुमार शर्मा (संयुक्त कलेक्टर)
पत्नी के नाम रीवा में लगभग 86 लाख रुपये का मकान ससुराल पक्ष से प्राप्त बताया गया।
महेंद्र सिंह सौजन्या (डिप्टी कलेक्टर)
चाचा से लगभग 90 लाख रुपये मूल्य की कृषि भूमि प्राप्त हुई।
रूपेश कुमार उपाध्याय (अपर कलेक्टर)
ससुराल पक्ष से एक करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की संपत्तियों का उल्लेख किया गया।
राजेश राठौड़
पत्नी के नाम लगभग 95 लाख रुपये से अधिक मूल्य की कृषि भूमि दर्ज है, जो ससुराल पक्ष से प्राप्त बताई गई।
राहुल कुमार पटेल (डिप्टी कलेक्टर)
ससुर द्वारा दी गई कृषि भूमि, जिसकी घोषित कीमत 35 लाख रुपये से अधिक बताई गई।
लोचनलाल अहिरवार (अतिरिक्त कलेक्टर)
ससुराल से प्राप्त प्लॉट, घोषित मूल्य लगभग 17.50 लाख रुपये।
शोभाराम सोलंकी (अतिरिक्त कलेक्टर)
सास की विरासत से प्राप्त भूमि, घोषित मूल्य लगभग 30 लाख रुपये।
जनता पूछ रही है...
क्या मध्य प्रदेश का कोई सामान्य शिक्षक, क्लर्क, पटवारी या पुलिसकर्मी भी ऐसी किस्मत लेकर पैदा होता है?
जब एक किसान की जमीन के नामांतरण में महीनों लग जाते हैं, जब आम आदमी को अपनी संपत्ति साबित करने के लिए तहसील से लेकर अदालत तक चक्कर काटने पड़ते हैं, तब करोड़ों की संपत्तियां रिश्तेदारी के रास्ते कैसे और कितनी आसानी से हस्तांतरित हो जाती हैं?
सबसे बड़ा सवाल
क्या सरकार ने कभी यह जांचने की कोशिश की
जिसने करोड़ों की संपत्ति उपहार में दी, उसकी आय कितनी थी?
संपत्ति का वास्तविक बाजार मूल्य क्या था?
उपहार और विरासत के पीछे वित्तीय क्षमता का परीक्षण हुआ या नहीं?
क्या इन मामलों का स्वतंत्र ऑडिट हुआ?
नियमों की आड़ या पारदर्शिता की मांग?
सेवा नियमों के अनुसार विरासत, उपहार या पारिवारिक हस्तांतरण से संपत्ति प्राप्त करना अवैध नहीं है, बशर्ते उसका खुलासा किया गया हो। लेकिन खुलासा कर देना ही अंतिम सत्य नहीं हो सकता। अखिल भारतीय सेवा नियमों में भी ऐसी संपत्तियों की सूचना सरकार को देने का प्रावधान है।
सरकार के लिए चुनौती
यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है तो सरकार को इन मामलों का स्वतंत्र सत्यापन कराकर अधिकारियों को क्लीन चिट देनी चाहिए।
लेकिन यदि करोड़ों की संपत्तियां केवल "रिश्तेदारी की कृपा" से बढ़ रही हैं, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि इस अमीरी का वास्तविक स्रोत क्या है।
निष्कर्ष
मध्य प्रदेश में संपत्ति घोषणाओं ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सरकारी नौकरी केवल वेतन का मामला नहीं रह गई है। कई अधिकारियों की संपत्ति का बड़ा हिस्सा विरासत, उपहार और रिश्तेदारी से जुड़ा हुआ है। अब फैसला सरकार को करना है—पारदर्शिता बढ़ानी है या सवालों को फाइलों में दबाए रखना है।
जनता जवाब चाहती है, क्योंकि सवाल करोड़ों की संपत्तियों का है।

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