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क्या मोहन "सरकार झूठ का पुलिंदा है" ?Is Mohan "the government a bundle of lies"?

 

मोहन राज में सब चंगा है, बस जनता थोड़ी परेशान है!

प्रणव बजाज

मध्य प्रदेश में इन दिनों सब कुछ शानदार चल रहा है। इतना शानदार कि यदि आप सरकार की प्रेस विज्ञप्तियां पढ़ लें तो लगेगा कि स्वर्ग ने अपनी शाखा भोपाल में खोल ली है। निवेश की नदियां बह रही हैं, रोजगार के पहाड़ खड़े हो रहे हैं, उद्योगों की फसल लहलहा रही है और विकास तो ऐसा दौड़ रहा है कि उसे देखने के लिए भी ड्रोन कैमरे की जरूरत पड़ रही है।


बस एक छोटी-सी समस्या है।

जनता को यह विकास दिखाई नहीं दे रहा।

लेकिन इसमें सरकार का क्या दोष? विकास दिखाई देने वाली चीज थोड़ी है, यह तो महसूस करने वाली चीज है। जैसे आत्मा, परमात्मा और चुनावी वादे।

सरकार कहती है कि हजारों करोड़ का निवेश आया है। जनता पूछती है कि रोजगार कहां है? जवाब मिलता है कि निवेश आ गया, रोजगार भी रास्ते में होगा। जनता पिछले कई वर्षों से उस रास्ते को देख रही है। अब तो रास्ते में भी घास उगने लगी है।

किसानों की हालत पर बात कीजिए तो सरकारी आंकड़े बताते हैं कि किसान खुश हैं। किसान बताते हैं कि वे परेशान हैं। सरकार कहती है कि आंकड़े झूठ नहीं बोलते। किसान कहते हैं कि हमारी फसल भी झूठ नहीं बोलती।

मध्य प्रदेश का किसान बड़ा अजीब प्राणी है। जब चुनाव आता है तो वह "अन्नदाता" कहलाता है। चुनाव खत्म होते ही वह "डेटा" बन जाता है। उसकी समस्या फाइल में, उसकी फसल रिपोर्ट में और उसका दर्द प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहुंच जाता है।

सरकार ने घोषणा की कि अस्पताल बेहतर होंगे।

जनता अस्पताल पहुंची।

डॉक्टर नहीं मिला।

सरकार ने कहा—भवन तो बन गया है।

जनता बोली—इलाज भी भवन ही करेगा क्या?

इंदौर के सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में स्टेंट की कमी की खबरें आती हैं। मरीज दिल पकड़कर इंतजार करता है और व्यवस्था फाइल पकड़कर।

सरकार कहती है स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत हुई हैं।

मरीज पूछता है—किस जिले में?

सबसे दिलचस्प कहानी सड़कों की है।

सड़क बनती है।

फिर टूटती है।

फिर बनती है।

फिर उद्घाटन होता है।

फिर मरम्मत होती है।

फिर टेंडर निकलता है।

ऐसा लगता है कि सड़क नहीं, सरकारी योजना का पुनर्जन्म चक्र चल रहा हो।

CAG रिपोर्टें आती हैं। कहीं राहत राशि में सवाल, कहीं सड़क निर्माण में सवाल, कहीं वित्तीय प्रबंधन पर सवाल। विपक्ष शोर मचाता है। सरकार कहती है सब नियम अनुसार हुआ है। जांच की घोषणा होती है। फाइल चलती है। फिर जनता इंतजार करती है कि दोषी कौन निकला?

लेकिन दोषी अक्सर उतना ही रहस्यमय होता है जितना किसी सरकारी वेबसाइट पर "अंडर प्रोसेस" लिखा हुआ आवेदन।

सरकार निवेश सम्मेलन करती है।

हजारों करोड़ के एमओयू साइन होते हैं।

मंच पर तालियां बजती हैं।

अखबारों में पूरे पेज के विज्ञापन छपते हैं।

लेकिन बेरोजगार युवक अगले दिन फिर उसी रोजगार कार्यालय की लाइन में खड़ा मिलता है।

उसे लगता है कि शायद निवेश और नौकरी के बीच कोई ऐसा विभाग है जो केवल नेताओं को दिखाई देता है।

फिर आता है योजनाओं का दौर।

हर महीने नई योजना।

हर सप्ताह नई घोषणा।

हर दिन नया लक्ष्य।

जनता को अब योजना का नाम सुनकर खुशी नहीं होती।

वह पूछती है—

"इसका बजट आया क्या?"

"इसका आदेश निकला क्या?"

"इसका लाभ मिला क्या?"

"या यह भी पोस्टर से सीधे इतिहास में चली जाएगी?"

लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी ताकत विज्ञापन नहीं, विश्वास होता है।

और विश्वास तब टूटता है जब घोषणा ज्यादा और परिणाम कम दिखाई दें।

जब किसान को भुगतान के लिए चक्कर लगाने पड़ें।

जब युवा रोजगार के लिए भटकता रहे।

जब मरीज अस्पताल में संसाधनों का इंतजार करे।

जब भ्रष्टाचार के आरोपों पर कार्रवाई की गति घोंघे से भी धीमी हो जाए।

तब जनता सवाल पूछती है।

और लोकतंत्र में जनता का सवाल ही सबसे बड़ा विपक्ष होता है।

मोहन राज की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं है।

सबसे बड़ी चुनौती वह नागरिक है जो अब आंकड़ों से ज्यादा अपनी जेब देखता है, भाषण से ज्यादा अपना गांव देखता है और विज्ञापन से ज्यादा अपनी समस्या।

क्योंकि आखिर में जनता को यह फर्क नहीं पड़ता कि मंच पर कितनी तालियां बजीं।

उसे फर्क पड़ता है कि उसके खेत में पानी आया या नहीं।

अस्पताल में इलाज मिला या नहीं।

बेटे को नौकरी मिली या नहीं।

और सड़क बरसात के बाद बची या नहीं।

बाकी सब तो लोकतंत्र का सांस्कृतिक कार्यक्रम है।

जिसमें जनता दर्शक है, नेता कलाकार हैं और विकास... अभी भी मुख्य अतिथि के आने का इंतजार कर रहा है।

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