देश की राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली से न्यायपालिका, कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के माध्यम से राष्ट्र का संचालन किया जाता है। नई दिल्ली एक राज्य भी है, जिसके नागरिकों की सुरक्षा और सुविधाओं की जिम्मेदारी राज्य सरकार तथा जिला प्रशासन पर है। किंतु विडंबना यह है कि अवैध निर्माण आज देश के लिए नासूर बन चुके हैं। इस समस्या की त्रासदीपूर्ण पीड़ा केवल राष्ट्रीय राजधानी तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के राज्यों की राजधानियों, महानगरों, नगरों, शहरों, कस्बों और गांवों तक फैल चुकी है। दिल्ली के मालवीय नगर स्थित एक होटल में हुए भीषण अग्निकांड में 21 देशी-विदेशी लोगों की दर्दनाक मौत ने एक बार फिर उस भयावह सच्चाई को उजागर कर दिया है, जहां रसूख और प्रभाव के आगे आम जनजीवन का कोई मूल्य नहीं रह जाता। देश में कहीं जर्जर और अवैध भवनों के ढहने से, कहीं अवैध रूप से तनी बहुमंजिला इमारतों में आग लगने से, कहीं जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण के कारण जलभराव से, तो कहीं अव्यवस्थित निर्माणों के चलते भगदड़ जैसी घटनाओं से आम नागरिकों की जानें लगातार जा रही हैं। इसके बावजूद प्रशासन अक्सर केवल कागजी कार्रवाई कर, गैर-इरादतन हत्या की एफआईआर दर्ज कर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर लेता है।
एक और हम लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत केंद्र, राज्य, महानगर, नगर और ग्राम पंचायत स्तर तक सरकार होने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी ओर इन्हीं संस्थाओं और प्रशासनिक तंत्र की नाक के नीचे अवैध निर्माण कैसे खड़े हो जाते हैं? यह प्रश्न व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हादसे होने और लोगों की जान जाने के बाद ही शासन-प्रशासन की तंद्रा टूटती है। तब संबंधित निर्माणों को अवैध घोषित कर दिया जाता है और दोषियों पर औपचारिक कार्रवाई शुरू होती है। प्रश्न यह है कि यदि नियमों को ताक पर रखकर बने ऐसे निर्माणों में लोगों की मृत्यु होती है, तो इसे केवल गैर इरादतन हत्या ही क्यों माना जाता है ? क्या अवैध निर्माण के मालिकों के साथ साथ उन प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों को भी जवाबदेह नहीं ठहराया जाना चाहिए, जिनकी अनदेखी या मिलीभगत से ऐसे निर्माण संभव हुए ?
मालवीय नगर की त्रासदी केवल दिल्ली सरकार के लिए ही नहीं, बल्कि देश की सभी राज्य सरकारों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। आवश्यकता इस बात की है कि राज्यों की राजधानियों से लेकर ग्राम पंचायत स्तर तक सभी प्रकार के अवैध निर्माणों के विरुद्ध व्यापक और सतत अभियान चलाया जाए। अवैध निर्माण करने वालों तथा उन्हें संरक्षण देने वाले जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो। साथ ही, ऐसे निर्माणों के कारण होने वाली मौतों को गंभीर आपराधिक उत्तरदायित्व की श्रेणी में रखते हुए दोषियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। तभी अवैध निर्माणों पर प्रभावी अंकुश लग सकेगा और आम नागरिकों के जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी।
आज देश का कड़वा सच यह है कि कहीं धनबल, कहीं बाहुबल और कहीं राजनीतिक रसूख के बल पर भू-माफिया शासकीय भूमि पर अतिक्रमण कर रहे हैं। नदियों, तालाबों और पहाड़ों का अस्तित्व सिकुड़ता जा रहा है। महानगरों, नगरों, कस्बों और गांवों में सार्वजनिक मार्गों तथा जल निकासी तंत्र पर अतिक्रमण कर लोगों की सुरक्षा को खतरे में डाला जा रहा है। यह स्थिति केवल कानून के उल्लंघन का मामला नहीं, बल्कि जनजीवन के साथ खिलवाड़ है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हर वर्ष आगजनी, जलभराव, भवन दुर्घटनाओं और भगदड़ जैसी घटनाओं में लोगों की मौत के बाद भी शासन-प्रशासन की जवाबदेही तय नहीं हो पाती। यही लचर व्यवस्था इन हादसों की पुनरावृत्ति का प्रमुख कारण है।
जब तक देश का जनमानस अवैध निर्माणों से होने वाली मौतों के प्रति जागरूक होकर शासन और प्रशासन से जवाब नहीं मांगेगा, तब तक ऐसे निर्माण होते रहेंगे और मालवीय नगर जैसी त्रासदियां आम जनजीवन को लीलती रहेंगी। दिल्ली के मालवीय नगर की हृदय विदारक घटना से पूरे देश को सबक लेने की आवश्यकता है। मानव सुरक्षा मानकों की अनदेखी कर बनाए गए प्रत्येक अवैध और असुरक्षित निर्माण को जनहित में ध्वस्त करना केवल शासन-प्रशासन ही नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की भी जिम्मेदारी है। विकास तभी सार्थक होगा, जब उसके केंद्र में मानव जीवन की सुरक्षा, कानून का सम्मान और जवाबदेही की सुदृढ़ व्यवस्था होगी। तभी हम एक सुरक्षित, सुव्यवस्थित और संवेदनशील भारत का निर्माण कर सकेंगे।
अरविंद रावल

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