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दाऊद का ‘ड्रग्स कॉर्पोरेट मॉडल’ बेनकाब: नशे की कमाई से खड़ी हो रही थीं मौत की फैक्ट्रियां!Dawood's 'Drugs Corporate Model' exposed: Factories of death were being built with the proceeds of drug trafficking!

 

बौद्धिक प्रतिकार | प्रणव बजाज

मुंबई।

भारत के खिलाफ छेड़े गए सबसे खतरनाक आर्थिक और सामाजिक युद्ध का एक नया चेहरा सामने आया है। यह युद्ध बंदूकों से नहीं, बल्कि युवाओं की नसों में उतारे जा रहे जहर से लड़ा जा रहा था। मुंबई क्राइम ब्रांच की गिरफ्त में आए दाऊद इब्राहिम के कथित करीबी और "मनी मैनेजर" सलीम डोला ने पूछताछ में जो खुलासे किए हैं, वे देश की सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गए हैं।


जांच में सामने आया है कि ड्रग्स सिंडिकेट अब केवल तस्करी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी तरह एक "कॉर्पोरेट इन्वेस्टमेंट मॉडल" पर काम कर रहा था। नशे के कारोबार से होने वाली काली कमाई को दुबई की संपत्तियों, बेनामी निवेशों और भारत में नई ड्रग्स निर्माण इकाइयों में लगाया जा रहा था।

30 प्रतिशत हिस्सा सीधे डोला के पास

पुलिस सूत्रों के अनुसार ड्रग्स की बिक्री से होने वाली कमाई का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा सीधे सलीम डोला के पास पहुंचता था। जांच एजेंसियों को आशंका है कि इसी रकम से दुबई में करोड़ों रुपये की अचल और बेनामी संपत्तियां खरीदी गईं।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पैसे का बड़ा हिस्सा वापस सिंडिकेट में लगाया गया, ताकि सातारा, मैसूर और अन्य स्थानों पर नई ड्रग्स फैक्ट्रियां स्थापित की जा सकें। यानी भारतीय युवाओं को बर्बाद कर कमाया गया पैसा फिर उसी देश में नशे का नया जाल बिछाने में लगाया जा रहा था।

मकोका आरोपी फैसल शेख का कबूलनामा

जांच में शामिल एक अन्य आरोपी फैसल जावेद शेख, जिस पर मकोका के तहत कार्रवाई की गई है, ने पूछताछ में स्वीकार किया कि उसे मेफेड्रोन और कोकीन की बड़ी खेप सीधे सलीम डोला से मिलती थी।

फैसल के खिलाफ पहले से एनडीपीएस एक्ट के कई गंभीर मामले दर्ज हैं। वर्ष 2017, 2023 और 2024 में उसके नेटवर्क से बड़ी मात्रा में मेफेड्रोन और कोकीन बरामद की जा चुकी है।

ड्रग्स नहीं, आर्थिक आतंकवाद

जांच एजेंसियों का मानना है कि यह मामला अब सिर्फ ड्रग्स तस्करी का नहीं रह गया है। इसके तार टेरर फंडिंग, हवाला नेटवर्क, दुबई में निवेश और दाऊद इब्राहिम के अंतरराष्ट्रीय आर्थिक तंत्र से जुड़ते दिखाई दे रहे हैं।

सवाल यह है कि यदि वर्षों तक यह नेटवर्क सक्रिय रहा तो आखिर इसकी भनक संबंधित एजेंसियों को पहले क्यों नहीं लगी? क्या ड्रग्स माफिया का नेटवर्क व्यवस्था से कई कदम आगे निकल चुका था?

देश के युवाओं पर हमला

विशेषज्ञों का कहना है कि नशे का कारोबार केवल अपराध नहीं, बल्कि देश की युवा पीढ़ी पर सुनियोजित हमला है। यदि जांच में सामने आए आरोप साबित होते हैं तो यह स्पष्ट होगा कि ड्रग्स सिंडिकेट केवल पैसा कमाने का जरिया नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक और आर्थिक संरचना को कमजोर करने का हथियार बन चुका है।

अब देश की नजर इस बात पर है कि क्या जांच एजेंसियां दाऊद के पूरे वित्तीय नेटवर्क तक पहुंच पाएंगी या फिर यह मामला भी कुछ गिरफ्तारियों और चार्जशीटों तक सिमट कर रह जाएगा।

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