इन विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठे हैं. एक वजह तो यह थी कि इतने बड़े पैमाने पर लोगों के नाम कटे. 90 लाख के आस-पास लोगों के नाम कटे. 27 लाख लोगों के नाम अपील में चल रहे थे.
दूसरी तरफ़ ऐसा कहा जाता रहा है पश्चिम बंगाल के चुनावों में पहले से भी हिंसा होती रही है. इस बार जो चुनाव हुए उसमें हिंसा नहीं दिखाई दी. चुनाव आयोग की भूमिका ख़ासतौर से पश्चिम बंगाल के चुनाव को देखते हुए क्या रही?
इस सवाल के जवाब में पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा कहते हैं, "जहां तक चुनाव शांतिपूर्वक ढंग से करवाने की बात है, मुझे लगता है कि चुनाव आयोग ने अच्छी तरह से यह चुनाव करवाया और इसकी दो वजह हैं. पहले छह-सात चरणों में चुनाव होता था. इस बार आयोग ने दो चरणों में चुनाव करवाया. यह भी है कि जो सरकार की तरफ से सुरक्षा बल उपलब्ध करवाए जाते हैं, वह बड़ी संख्या में चुनाव आयोग को उपलब्ध करवाए गए, जिससे वह उनको तैनात कर सका और दो चरणों में यह चुनाव करवा दिए."
"लेकिन विपक्ष का कहना है कि बहुत ज्यादा फ़ोर्स लगाई गई और इससे लोगों में एक डर का माहौल बना. यह सही है कि पहले की तुलना में ज्यादा फ़ोर्स लगाई गई है, लेकिन उस आकलन से विवाद पैदा करना मेरे ख्याल से उचित नहीं है."

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