पश्चिम बंगाल की राजनीति में सोमवार को वो दिन आया जिसे सत्ता परिवर्तन 2.0 कहा जा रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने ही गढ़ और निवास स्थान भवानीपुर से चुनाव हार गई हैं। भाजपा के सुवेंदु अधिकारी ने 2021 के नंदीग्राम संग्राम की तरह ही 2026 में भवानीपुर में ममता बनर्जी को हराकर उनके 15 साल के लंबे शासन पर पूर्णविराम लगा दिया है। जानें ममता के हारने के 5 वो बड़े कारण जिसने छीन ली दीदी की कुर्सी।
आखिरी क्यों पलों में पलटा पासा
भवानीपुर की मतगणना किसी सस्पेंस फिल्म जैसी रही। पोस्टल बैलेट की गिनती में सुवेंदु ने शुरुआती बढ़त बनाई। ममता बनर्जी ने जबरदस्त वापसी की और एक समय वह 19,000 वोटों से आगे निकल गईं। टीएमसी खेमे में जश्न शुरू हो गया था। जैसे-जैसे शहरी और मिश्रित आबादी वाले बूथों की गिनती हुई सुवेंदु ने वापसी की। 20 में से 18वें राउंड तक सुवेंदु ने 11,000 की लीड ले ली और अंत में जीत का परचम लहराया।
क्यों हारीं ममता दीदी? हार के 5 बड़े कारण
1. आरजी कर कांड का गुस्सा: आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुई डॉक्टर की हत्या और बलात्कार की घटना ने राज्य की महिलाओं को झकझोर दिया था। महिला सुरक्षा के मुद्दे पर ममता बनर्जी की रक्षक वाली छवि को गहरा धक्का लगा जिसका असर पोलिंग बूथ पर साफ दिखा।
2. मिनी इंडिया का बदलता मिजाज: भवानीपुर में 42% बंगाली हिंदू और 34% गैर-बंगाली (गुजराती, मारवाड़ी) आबादी है। इस बार सुवेंदु ने न केवल व्यापारी वर्ग बल्कि बंगाली हिंदू मतदाताओं को भी अपने पक्ष में करने में सफलता पाई।
3. मतदाता सूची से नामों का हटना: मतदाता सूची में संशोधन (SIR) के दौरान भवानीपुर से लगभग 47,000 से 51,000 नाम हटा दिए गए। टीएमसी का दावा है कि इनमें से अधिकांश उनके पारंपरिक समर्थक थे जिससे पार्टी का वोट बैंक प्रभावित हुआ।
4. भ्रष्टाचार और सिंडिकेट राज: 15 सालों के शासन के बाद जनता में भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और सिंडिकेट प्रणाली को लेकर भारी आक्रोश था। सुशासन के दावों पर भ्रष्टाचार भारी पड़ा।
5. योजनाओं से आगे बढ़ी जनता: लक्ष्मी भंडार' और 'कन्याश्री' जैसी नकद सहायता योजनाएं अब शिक्षित मध्यम वर्ग को लुभाने में नाकाम रहीं। महिलाएं अब 500-1000 रुपये की आर्थिक मदद के बजाय अपने बच्चों के लिए सुरक्षित भविष्य और रोजगार चाहती हैं।
सुवेंदु का चाणक्य दांव
भाजपा ने भवानीपुर को प्रतिष्ठा की लड़ाई बनाया था। गृहमंत्री अमित शाह खुद सुवेंदु के नामांकन में शामिल हुए। भाजपा की रणनीति 'गैर-मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण' और बूथ स्तर पर सटीक मैपिंग पर टिकी थी। सुवेंदु ने 'मैथमेटिकल चक्रव्यूह' रचकर ममता के गढ़ को ढहा दिया।
भावुक ममता और बेबस TMC
चुनाव प्रचार के दौरान ही ममता बनर्जी के भाषणों में आत्मविश्वास की कमी दिखने लगी थी। एक रैली में भाजपा के शोर से परेशान होकर जब उन्होंने मंच छोड़ा और कहा— "अगर आप कर सकते हैं, तो मुझे वोट दें", तभी राजनीतिक विश्लेषकों ने मान लिया था कि दीदी को अपनी हार का आभास हो चुका है।

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