बौद्धिक प्रतिकार | प्रणव बजाज
आईएएस-आईपीएस, मंत्री, सांसद, विधायक, महापौर, अध्यक्ष, चेयरमैन... सत्ता के गलियारों में चलते-चलते कई लोग यह भ्रम पाल लेते हैं कि कुर्सी ही उनकी पहचान है। सलाम करने वाले लोग, आगे-पीछे घूमते कर्मचारी, चमचों की फौज, लालबत्ती का रौब और फोन उठते ही दौड़ पड़ने वाला सिस्टम — यही उन्हें जीवन का सच लगने लगता है।
लेकिन सच बहुत क्रूर होता है।
जिस दिन कुर्सी जाती है, उसी दिन पता चलता है कि सम्मान व्यक्ति का था या पद का। जो लोग कल तक “सर-सर” करते नहीं थकते थे, वे नजरें चुराने लगते हैं। जिनके दरबार में भीड़ लगी रहती थी, उनके घर के दरवाजे पर सन्नाटा खड़ा मिलता है।
आज हजारों सेवानिवृत्त अफसर, नेता और बड़े पदाधिकारी इसी सच्चाई से जूझ रहे हैं। नौकरी में रहते हुए परिवार के लिए समय नहीं, दोस्तों के लिए समय नहीं, समाज के लिए समय नहीं। पूरी जिंदगी सिर्फ सत्ता, प्रभाव और अहंकार की खेती में निकल गई। रिटायरमेंट के बाद जब सुबह उठते हैं तो न फाइल होती है, न पीए, न गाड़ी, न सुरक्षा कर्मी, न फोन की घंटियां।
सबसे बड़ा संकट तब आता है जब आदमी को खुद से मिलना पड़ता है।
जिन्होंने पूरी जिंदगी लोगों को डराया, दबाया, एहसान जताए, नियमों को अपनी जागीर समझा, वे बुजुर्गावस्था में अकेलेपन से डरते नजर आते हैं। क्योंकि उन्होंने रिश्ते नहीं बनाए, केवल उपयोगी संपर्क बनाए थे। संपर्क कुर्सी के साथ चले जाते हैं, रिश्ते जीवनभर रहते हैं।
विडंबना देखिए, जो अफसर जनता को घंटों इंतजार करवाते थे, वही रिटायरमेंट के बाद अपने बच्चों के फोन का इंतजार करते दिखाई देते हैं। जो नेता जनता को महत्व नहीं देते थे, वे बुढ़ापे में मिलने आने वाले दो लोगों के लिए तरसते हैं।
कुर्सी एक किराये का कमरा है, स्थायी मकान नहीं।
इसलिए सत्ता का नशा करने वालों को समझ लेना चाहिए कि अंत में न पद साथ जाता है, न प्रोटोकॉल, न काफिला। साथ जाते हैं तो केवल कर्म, व्यवहार और वे रिश्ते जिन्हें आपने ईमानदारी से कमाया हो।
कुर्सी रहते हुए इंसान बनना सीख लीजिए, क्योंकि कुर्सी जाने के बाद केवल इंसान ही बचता है।
कुर्सी की सबसे बड़ी त्रासदी यही है — वह आपको यह भ्रम दे देती है कि दुनिया आपसे चल रही है, जबकि सच यह है कि दुनिया आपके बिना भी चलती रहती है।


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