• रवि उपाध्याय
अप्रैल माह में जिन चार राज्यों असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और एक केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी की विधानसभाओं के लिए मतदान हुआ था उनकी मतगणना के नतीजे सोमवार 04 मई को घोषित कर दिए गए। इन नतीजों के अनुसार तीन राज्यों क्रमशः केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में वोटर्स ने मौजूदा सरकारों का तख्ता पलट कर दिया। जबकि असम और केंद्र शासित पुद्दुचेरी में यथा स्थिति रहीं। इन राज्यों में एनडीए की सरकारें बरकरार रहीं। जबकि केरल में पिछले दस सालों से सत्तारूढ़ वाम मोर्चा की सरकार को कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने 140 सदस्यों की विधान सभा में बहुमत पा कर सत्ता से बाहर कर दिया। UDF में भा.रा. कांग्रेस, मुस्लिम लीग, केरल कांग्रेस के विभिन्न धड़े और क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी (RSP)शामिल हैं।
वैसे तो चुनाव कोई भी और किसी भी राज्य में हों सभी महत्वपूर्ण होते हैं। पर उपरोक्त चुनावों में पूरे देश और विदेश की निगाहें पश्चिम बंगाल के चुनावों पर टिकी हुई थीं। इसकी मुख्य वजह ममता बनर्जी की 15 साल की सरकार तो थी ही साथ ही वहां की जनता ममता बनर्जी सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदू उपेक्षा से आहत थी। सरकार अहंकार, भ्रष्टाचार, कट मनी महिलाओं के साथ दुष्कर्मों की घटना के कारण बदनाम हो चुकी थी। सरकार पर एक तरह से एक समुदाय का कब्जा होने और घुसपैठियों को पनाह देने संबंधी अनेक आरोप थे। इतना ही नहीं ममता सरकार पिछले एक दशक से केंद्र सरकार को निरंतर चुनौती देते हुए नज़र आतीं थीं। वह संसद द्वारा पारित कानूनों का विरोध तो करतीं ही थीं साथ ही उन्हें पश्चिम बंगाल में लागू न होने देने का वादा भी कर के संविधान को लगातार चुनौती देती नजर आतीं थीं। इसका असर अन्य राज्यों पर भी पड़ रहा था। उनका यह संविधान विरोधी कदम देश की जनता को बिल्कुल पसंद नहीं आया।
असम में मतदाताओं ने भारी बहुमत से भाजपा को लगातार तीसरी बार सत्ता के सिंहासन पर बैठा दिया। केरल, असम, पुडुचेरी और तमिलनाडु में सभी विधान सभा क्षेत्रों के चुनाव आ चुके हैं। यहां दस सालों से सत्तारूढ़ डीएमके को वोटर्स ने सत्ता से बुरी तरह बाहर कर दिया है। डीएमके से तमिलनाडु के मतदाता इस कदर नाराज़ थे कि वहां के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन और उनके पुत्र और राज्य के उप मुख्यमंत्री उदय निधि स्टालिन भी चुनाव हार गए। यह वही उदय निधि स्टालिन हैं जिन्होंने सनातन धर्म की तुलना डेंग्यू, मलेरिया और एचआईवी से करते हुए इसका समूल रूप से उन्मूलन करने का आव्हान किया था। यहां ये बता दें कि स्टालिन का पूरा परिवार क्रिश्चियन है। इसी तरह तमिलनाडु में नई सरकार बनाने के दावेदार TVK के सी विजय भी क्रिश्चियन हैं। उन्होंने राज्य की 234 सदस्यीय विधान सभा में 107 सीटें जीती हैं।
भय और भ्रष्टाचार से आक्रांत थी जनता:
सन् 2011 में जब ममता बनर्जी पहली बार पश्चिम बंगाल की सत्ता में आईं तो उनकी सरकार मां - माटी और मानुष की बात करतीं थी। लेकिन बीते 15 सालों में वह इन तीनों की लाज नहीं रख पाईं। वे राज्य में होने वाली घुसपैठ का मुद्दा उठा कर सत्ता में आईं थीं लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया वही घुसपैठिए उनका बड़ा वोट बैंक बन गया। इतना ही उनके कार्यकाल में पड़ोसी देश से बांग्लादेशी मुस्लिमों घुसपैठ बढ़ती गई। राज्य की माटी पर घुसपैठियों का कब्ज़ा होता चला गया और वो सोनार बांग्ला के मूल मानुष के अधिकारों को छीनते चले गए। इसके चलते पश्चिम बंगाल के मूल निवासी रोजगार की तलाश में दर दर भटकते हुए अन्य राज्यों में पलायन को मजबूर हो गए। राज्य रोजगार विहीन हो गया। ममता सरकार के पतन का यह भी एक बड़ा कारण रहा। 2021के विधानसभा चुनावों के चुनावी हिंसा में 80 हज़ार लोगों को अपना घर बार छोड़ कर निकटवर्ती राज्यों में शरण लेना पड़ी।
हार का गलत आंकलन : टीएमसी सहित अन्य विपक्ष पश्चिम बंगाल में अपनी हार के लिए मतदाता सूचियों के विशेष गहन परीक्षण को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं वे इस हार की गलत समीक्षा कर रहे हैं। सही तो यह है कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी अपनी गलतियों, मुस्लिम तुष्टिकरण, भारी करप्शन, भेदभाव, कानून व्यवस्था की दुर्व्यवस्था, महिला अपराधों में वृद्धि और विकास कार्यों की उपेक्षा के कारण सत्ता से बाहर हुई है। हार के एक कारण एसआईआर भी है। SIR के कारण ऐसे 90 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से हटा दिए गए जो या तो मर चुके थे या जो राज्य छोड़ कर दूसरे राज्यों में पलायन कर गए थे या ऐसे लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए जो भारत के नागरिक होने अथवा 2002 की वोटर लिस्ट में होना साबित नहीं कर सके। इन्हीं कथित मतदाताओं के फर्जी वोट डाले जाते थे। न्यूज़ चैनलों में दिखाया गया कि SIR जांच के समय लाखों घुसपैठिए पकड़े जाने के डर से रातों रात पड़ोसी देश में भाग गए।
तुष्टिकरण पर करारा तमाचा : पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ दल का चुनाव हारना अन्य सियासी दलों को एक सबक भी है कि देश का बहुसंख्यक मतदाता सभी वर्गों के साथ एक सा व्यवहार चाहता है। वह किसी वर्ग विशेष के तुष्टिकरण की निति के खिलाफ है। वह सबके साथ एक बराबर व्यवहार चाहता है। संविधान की भी यही भावना है। सबका संतुष्टीकरण करना यह सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है। एक वर्ग विशेष के तुष्टिकरण से समाज में विभेद बढ़ता है यह बात नेताओं को समझ लेना चाहिए। एक अनुमान के अनुसार देश में इस समय पांच करोड़ से अधिक घुसपैठिए विभिन्न राज्यों में चोरी छिपे रह रहे हैं।
संसद द्वारा पारित कानूनों का विरोध : पिछले दस सालों में जब से 2014 में मोदी सरकार केंद्र में आई है तभी से ममता बनर्जी मोदी सरकार के खिलाफ असहयोगात्मक रवैया अपनाए हुए थी। संसद द्वारा बनाया गया CAA कानून हो, तीन तलाक के खिलाफ कानून हो, या वक्फ कानून हो,130 वां संविधान संशोधन बिल हो या तीन नए आपराधिक कानून हों या नोटबंदी और GST कानून या आधार नियम, नई शिक्षा निति ही क्यों न हों ममता बनर्जी ने संसद द्वारा पारित उन सभी कानूनों का विरोध करते हुए कहा कि उनकी सरकार केंद्र का कोई भी कानून अपने राज्य में लागू नहीं करेगी। इसके चलते देश में संवैधानिक अराजकता का माहौल बना। इतना ही नहीं उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पश्चिम बंगाल आगमन पर प्रोटोकाल की अपेक्षा कर उक्त कार्यक्रम का एक तरह से बहिष्कार किया। सही कहा जाए तो यह कहा जा सकता है कि ममता सरकार के अहंकार, भ्रष्टाचार, बेवजह केंद्र से विरोध और विद्रूप तुष्टिकरण का घड़ा लबालब भर गया था जो 04 मई को बीच बाजार फूट गया। इससे सभी राज्य सरकारों और सियासी दलों को सबक सीखना चाहिए

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