रायपुर। रायपुर-विशाखापत्तनम कॉरिडोर के भूमि अधिग्रहण में गांधी परिवार का जमीन बंटवारा मॉडल जांच में बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है, जहां बड़े भूखंडों को भाई-भतीजों, बहू-बेटियों के नाम पर छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर करोड़ों रुपये का मुआवजा लिया गया।
एक ही खसरे के कई प्लॉट, गांधी परिवार व जुड़े लोग ने अभनपुर व आसपास क्षेत्र में अधिसूचना के बाद मुआवजा राशि बढ़ाने के लिए 10 से 30 तक हिस्सों में जमीन विभाजित कर अलग-अलग नामांतरण करा लिया।
एक जमीन के कई मालिक दिखा बार-बार भुगतान लिया
जांच में सामने आया कि दस्तावेजों में एक ही जमीन के कई मालिक दिखाकर बार-बार भुगतान लिया गया। इस पैटर्न ने पूरे घोटाले की परतें खोल दी हैं और अधिकारियों की भूमिका भी सवालों में है। ईओडब्ल्यू की जांच में इस तरह के और मामलों के राजफाश की संभावना जताई जा रही है।
एक खसरा, सात हिस्से, हर नाम पर मुआवजा
खसरा नंबर 1265 विनय कुमार गांधी के नाम पर दर्ज है, उसे सात अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया। इन सभी प्लाटों का नामांतरण परिवार के सदस्यों के नाम किया गया और हर हिस्से पर अलग-अलग मुआवजा लिया गया। खसरा नंबर 2026 को 17, 2023 को 11 और 2033 को 10 हिस्सों में बांटकर अलग-अलग नामों से दर्ज किया गया।
इन सभी मामलों में एक ही परिवार के सदस्यों के नाम बार-बार सामने आए। इससे संकेत मिलता है कि जमीन के कृत्रिम बंटवारे के जरिये मुआवजा बढ़ाने की सुनियोजित रणनीति अपनाई गई।
जांच में खुल रहे नए तरीके
ईडी की जांच में सामने आया है कि केवल जमीन बंटवारा ही नहीं, बल्कि दस्तावेजों में हेरफेर कर सरकारी जमीन को भी निजी दिखाया गया। कई खसरों को 30 से 60 हिस्सों में बांटकर मुआवजा लिया गया। एजेंसियां अब हर खसरे की जांच कर रही हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि किन-किन लोगों ने इस खेल में फायदा उठाया और इसमें किस स्तर तक मिलीभगत रही।

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