Top News

विकसित भारत की राह के रोड़े, सरकारी दखल का होता है दुष्प्रभाव Obstacles on the path to a developed India: the negative consequences of government intervention

सम्पादकीय

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नव वर्ष के आगमन के ठीक पहले पिछले वर्ष की उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि देश अब रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार हो गया है। इसके उपरांत उन्होंने सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी आधारित बहुआयामी मंच ‘प्रगति’ की बैठक में सड़क, रेलवे, बिजली, जल संसाधन और कोयला सहित विभिन्न क्षेत्रों की पांच महत्वपूर्ण अवसंरचना परियोजनाओं की समीक्षा की।



इस बैठक में उन्होंने देश को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए सुधार, प्रभावी क्रियान्वयन और व्यापक परिवर्तन बेहद जरूरी बताए। प्रधानमंत्री ने 2025 में किए गए जिन महत्वपूर्ण सुधारों का उल्लेख किया था, उनमें जीएसटी में व्यापक बदलाव, बीमा क्षेत्र में सौ प्रतिशत विदेशी पूंजी निवेश को अनुमति, ग्रामीण रोजगार कानून मनेरगा में आमूलचूल परिवर्तन और श्रम संहिताओं को लागू करने और परमाणु ऊर्जा से जुड़े सुधारों का उल्लेख किया।


निःसंदेह जीएसटी में सुधार से आम आदमी को लाभ मिला है, लेकिन अन्य सुधारों का लाभ मिलने में समय लगेगा। मोदी सरकार विभिन्न क्षेत्रों में लगातार सुधार करने के साथ नई योजनाएं और कार्यक्रम शुरू करती रही है। इनके जरिये उसने सुशासन स्थापित करने की कोशिश की है ताकि जनता की समस्याओं का समाधान हो और देश तेजी के साथ आगे बढ़े।


इसमें संदेह नही कि प्रशासनिक कामकाज में सरकारी नियंत्रण कम होने और विभिन्न क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की भागीदारी से आम जनता को लाभ मिलता है, लेकिन यह भी सच है कि कोई भी देश सरकारी नियंत्रण के बिना नहीं चलता, लेकिन यह नियंत्रण एक सीमा तक ही होना चाहिए। अपने देश में सरकारी नियंत्रण कम करने की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन उनके अनुरूप कुछ ठोस होता हुआ नहीं दिखता और इसीलिए पश्चिमी देश अभी भी यह शिकायत करते हैं कि भारत में सरकारी नियंत्रण अधिक है।


वे इस नियंत्रण को सरकारी हस्तक्षेप के रूप में देखते हैं। इसी तरह विदेशी निवेशक भी कारोबारी सुगमता में तमाम सुधार होने के बाद भी भारत में काम करने में बाधाएं देखते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियां यह शिकायत करती ही रहती हैं कि भारत में कोई उद्योग-व्यापार स्थापित करना अभी भी कठिन बना हुआ है, क्योंकि कदम-कदम पर सरकारी अनुमति की आवश्यकता पड़ती है।


मोदी सरकार की ओर से पिछले 11 सालों में उद्योग-व्यापार स्थापित और उन्हें संचालित करने में सरकारी दखल को कम करने के तमाम कदम उठाए जाने के बाद भी स्थितियां वैसी नहीं बन सकी हैं, जैसी बननी चाहिए। इस मामले में बात केवल केंद्र सरकार की ही नहीं, राज्य सरकारों की भी है। देश के सभी राज्यों का रवैया उद्योग एवं व्यापार के बहुत अनुकूल नहीं कहा जा सकता और इसीलिए विकसित भारत के लक्ष्य में बाधाएं खड़ी हुई दिखती हैं।


यह एक तथ्य है कि विकसित भारत के लक्ष्य को पाने के लिए देश में जैसी कारोबारी सुगमता होनी चाहिए, वैसी नहीं है। कारोबारी सुगमता केवल होनी ही नहीं चाहिए, बल्कि वह दिखनी भी चाहिए- खास तौर पर कारोबारियों को। इसी तरह सरकारी तंत्र को जन समस्याओं के समाधान में तत्पर दिखना चाहिए। अधिकांश मामले में इस तत्परता का अभाव ही दिखता है।


निःसंदेह यह आशा की जा रही है कि इस नए वर्ष में भी सुधारों का सिलसिला कायम रहेगा। जनता और उद्योग-व्यापार जगत उन क्षेत्रों में सुधार की खास तौर पर उम्मीद कर रहा है, जहां उनकी गति धीमी है। बतौर उदाहरण शहरी ढांचे को ठीक करने के लिए जैसे कदम उठाए जाने आवश्यक हो गए हैं, उनमें देरी नहीं की जानी चाहिए। इसलिए और भी, क्योंकि नगर निकायों के कामकाज में अपेक्षित सुधार न होने से शहरी नागरिकों की समस्याएं दूर होने का नाम नहीं ले रही हैं।


हमारे शहर आबादी के बोझ तले दब रहे हैं और उनका ढांचा चरमरा रहा है। बात चाहे सीपीडब्ल्यूडी की हो या पीडब्ल्यूडी की, वे ढंग की सड़कें भी नहीं बना पा रहे हैं। यही स्थिति नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने वाले अन्य विभागों की भी है। उनकी ओर से किए जाने वाले कार्यों की गुणवत्ता ठीक नहीं हो पा रही है। उनके कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव भी व्याप्त है। यह तब है, जब सब जानते हैं कि शहर आर्थिक विकास के इंजन हैं।


अपने देश में समस्या केवल सरकारी कामकाज में गुणवत्ता के अभाव की ही नहीं है। यह अभाव उद्योग-व्यापार जगत में भी देखने को मिलता है। यह समझा जाना चाहिए कि सरकारी और निजी क्षेत्र की कामकाज की गुणवत्ता ठीक करके ही विकसित भारत की नींव को मजबूत किया जा सकता है। जब सरकारी कामकाज दोयम दर्जे का होता है, तब उसका दुष्प्रभाव कहीं अधिक होता है, क्योंकि हर कहीं सरकारी दखल है और सरकारें सबसे बड़ी नियोक्ता हैं।


विडंबना यह है कि औसत सरकारी कर्मियों का काम न तो पारदर्शी ढंग से होता है और न ही जवाबदेही के साथ। गुणवत्ता को प्राथमिकता देने के बजाय जुगाड़ संस्कृति पर जोर दिया जाता है। दुर्भाग्य यह है कि देश में कम ही निजी उद्योग हैं, जहां गुणवत्ता और उत्पादकता को प्राथमिकता दी जाती है। यह एक तथ्य है कि भारत के बहुत कम उत्पाद विश्वस्तरीय गुणवत्ता के लिए जाने जाते हैं। यदि सरकार अपने हर काम की गुणवत्ता ठीक करने को प्राथमिकता दे तो उसका प्रभाव निजी क्षेत्र पर भी पड़ेगा।

सरकारी क्षेत्र में अपेक्षित बदलाव तभी संभव है, जब देश की नौकरशाही के सोच में आमूलचूल परिवर्तन आएगा। समस्या यह है कि फिलहाल सरकार के एजेंडे पर यह दिख नहीं रहा है। नौकरशाही में सुधार की जो प्रतीक्षा की जा रही है, वह इस नए वर्ष पूरी होनी चाहिए। नौकरशाही को अपने कामकाज के तौर-तरीकों के साथ अपनी मानसिकता भी बदलनी चाहिए। इसी के साथ यह भी आवश्यक है कि जनप्रतिनिधि भी अपने काम का तरीका और सोच बदलें। यह भी समय की मांग है कि आम जनता भी अपना कार्य-व्यवहार बदले।


उसे अपने अधिकारों के प्रति सचेत होने के साथ ही कर्तव्यों के प्रति भी सजग होना चाहिए। क्या कभी इसकी चर्चा होती है कि एक नागरिक के तौर पर हम अपने संवैधानिक कर्तव्यों के प्रति कितने जागरूक हैं? देश के हर व्यक्ति को, चाहे वह सरकारी कर्मचारी हो या फिर कारोबारी या फिर श्रमिक अथवा अन्य कोई, अपना काम इस तरह करने के लिए तत्पर रहना चाहिए, जिससे विकसित भारत की नींव मजबूत हो।

Post a Comment

Previous Post Next Post