सी.ए. तेजेश सुतरिया
भारतीय सनातन परंपरा में मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सूर्य की दिशा-परिवर्तन के साथ जीवन, प्रकृति और चेतना के जागरण का प्रतीक है। यह वह शुभ क्षण है जब सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण की ओर अग्रसर होता है और इसी परिवर्तन के साथ प्रकाश, ऊर्जा और सकारात्मकता का एक नया चक्र आरंभ होता है।
मकर संक्रांति उस खगोलीय घटना को दर्शाती है जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उनकी गति दक्षिणायण से उत्तरायण की ओर हो जाती है। यह परिवर्तन केवल आकाशीय नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन, कृषि चक्र, मानव स्वास्थ्य और मानसिक ऊर्जा पर भी गहरा प्रभाव डालता है।
सनातन परंपरा में सूर्य को जीवन, ऊर्जा और चेतना का आधार माना गया है, इसलिए उनके मार्ग परिवर्तन को नवचेतना, सकारात्मकता और प्रगति के आरंभ का संकेत समझा जाता है। इसी कारण मकर संक्रांति को नए प्रकाश, नए संकल्प और नए उत्साह के पर्व के रूप में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
मकर संक्रांति भारत के विभिन्न भागों में पोंगल, उत्तरायण, बिहू और लोहड़ी जैसे नामों से मनाई जाती है।
पूर्व, दक्षिण और उत्तरायण का सांकेतिक महत्व
सूर्य का उदय सदैव पूर्व दिशा से होता है, जिसे प्रकाश, ज्ञान और आरंभ का प्रतीक माना गया है। जब सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर गति करता है, तो इसे ऊर्ध्वगामी चेतना, विकास और प्रगति का संकेत माना जाता है।
इसी कारण मकर संक्रांति के दिन किया गया हर शुभ कर्म— स्नान, दान, जप और सेवा— विशेष फलदायी माना गया है।
शास्त्रों में उत्तर-पूर्व दिशा को ईशान कोण कहा गया है, जिसे देवत्व और चेतना का केंद्र माना जाता है। मकर संक्रांति के दिन नदियों में स्नान, प्रार्थना और ध्यान का संबंध इसी दिशा से जोड़ा गया है, जिससे व्यक्ति के भीतर मानसिक शुद्धता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
शास्त्रीय ग्रंथों में उत्तरायण काल को प्रकाश और उन्नति से जोड़ा गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में इसका उल्लेख इस प्रकार मिलता है
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥
(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 8, श्लोक 24)
अर्थात प्रकाश, दिन, शुक्ल पक्ष और सूर्य का उत्तरायण काल— यह वह मार्ग है जिसे ज्ञान, चेतना और उन्नति से जोड़ा गया है। इसी कारण इस समय किए गए शुभ कर्मों को विशेष फलदायी माना गया है।
सूर्य और शनि : पिता-पुत्र का प्रतीकात्मक मिलन
मकर राशि के स्वामी शनि देव हैं और सूर्य उनके पिता माने जाते हैं। इस दृष्टि से मकर संक्रांति को पिता-पुत्र के मिलन का प्रतीक भी माना गया है। यह पर्व समाज को यह महत्वपूर्ण संदेश देता है कि— तेज और अनुशासन, नेतृत्व और संयम— जब संतुलन में आते हैं, तभी जीवन और समाज में स्थायित्व एवं समृद्धि आती है।
तिल-गुड़ और दान की परंपरा
मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का सेवन एवं दान स्वास्थ्य और सामाजिक सौहार्द— दोनों से गहराई से जुड़ा है। तिल ऊर्जा, संरक्षण और शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जबकि गुड़ जीवन में मधुरता और संबंधों में सरलता का। यह परंपरा हमें यह संदेश देती है— कटुता छोड़ें और जीवन में मिठास बनाए रखें।
इस वर्ष 14 व 15 जनवरी को मकर संक्रांति
इस वर्ष मकर संक्रांति 14 एवं 15 जनवरी को मनाई जाएगी। सूर्य के उत्तरायण होने पर श्रद्धालु नदियों एवं पवित्र जल में स्नान करेंगे। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इस बार संक्रांति में देवी का वाहन शेर और उपवाहन घोड़ा रहेगा, जो साहस, सुख-शांति और मंगलकारी ऊर्जा का संकेत देता है। लोक-ज्योतिषीय दृष्टि से, इस वर्ष देवी को युवा और सक्रिय स्वरूप में देखा जाएगा— न अत्यधिक उग्र और न ही शिथिल। यह संकेत देता है कि आने वाला समय परिश्रम के साथ प्रगति और संयम के साथ संतुलन का रहेगा।
इस वर्ष संक्रांति के साथ ग्यारस (एकादशी) भी पड़ रही है। कुछ मान्यताओं में इस दिन चावल दान नहीं किया जाता, किंतु दान का मूल भाव भावना और सेवा है। अतः अपनी श्रद्धा और इच्छानुसार चावल सहित अन्य अन्न का दान भी किया जा सकता है।
पतंगबाजी : उत्साह और ऊँचाइयों का प्रतीक
मकर संक्रांति पर आकाश में उड़ती रंग-बिरंगी पतंगें केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, आकांक्षा और सामूहिक आनंद का प्रतीक हैं। पतंगबाजी यह संदेश देती है कि— जीवन में संतुलन बनाए रखते हुए ऊँचाइयों को छूना ही सच्ची सफलता है।
मकर संक्रांति हमें यह स्मरण कराती है कि जब सूर्य अपनी दिशा बदल सकता है, तो मानव भी अपने विचार, दृष्टिकोण और जीवन-पथ को सकारात्मक दिशा दे सकता है। पूर्व से प्रकाश, उत्तर से प्रगति और उत्तर-पूर्व से चेतना— यही मकर संक्रांति का शाश्वत संदेश है।
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