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मकर संक्रांति: एक पर्व, अनेक नाम, एक ही आत्मा — यही है। मेरा भारत महान Makar Sankranti: One festival, many names, one spirit – that's what it is. My India is great!



अजय कुमार बियानी

इंजीनियर एवं लेखक

“मेरा भारत महान” केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारत की जीवंत संस्कृति, विविध परंपराओं और अद्भुत एकता का सार है। जब देश के अलग-अलग कोनों में एक ही सूर्य-गति को अलग-अलग नामों, रीति-रिवाजों और उल्लास के साथ मनाया जाता है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत की आत्मा कितनी व्यापक और समावेशी है। मकर संक्रांति ऐसा ही एक पर्व है, जो खगोलीय घटना होने के साथ-साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का उत्सव बन जाता है।

मकर संक्रांति सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व है। यह परिवर्तन केवल आकाश में नहीं होता, बल्कि मानव जीवन में भी नई ऊर्जा, नई दिशा और नई आशा का संचार करता है। यही कारण है कि यह पर्व भारत के लगभग हर राज्य में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है, और हर रूप अपने भीतर उस क्षेत्र की मिट्टी, श्रम, संस्कृति और आस्था को समेटे होता है।

उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। तिल-गुड़ का सेवन, दान-पुण्य और सूर्य उपासना इस पर्व की पहचान है। माना जाता है कि तिल की गर्म तासीर शीत ऋतु को विदा करती है और गुड़ जीवन में मिठास का संदेश देता है। पंजाब और हरियाणा में यही पर्व लोहड़ी के रूप में प्रकट होता है, जहाँ अग्नि के चारों ओर सामूहिक नृत्य, गीत और उल्लास किसान जीवन की कृतज्ञता को व्यक्त करते हैं। नई फसल के स्वागत का यह उत्सव श्रम और प्रकृति के संतुलन का प्रतीक है।

गुजरात और राजस्थान में मकर संक्रांति पतंगोत्सव बन जाती है। नीले आकाश में रंग-बिरंगी पतंगें मानो भारत की आकांक्षाओं को उड़ान देती हैं। छतों पर खड़े लोग जब पतंग की डोर थामते हैं, तो वह केवल खेल नहीं रहता, बल्कि जीवन की ऊँचाइयों को छूने का प्रतीक बन जाता है। इसी समय महाराष्ट्र में तिलगुल का आदान-प्रदान कर यह संदेश दिया जाता है कि “तिलगुल घ्या, गोड गोड बोला” — अर्थात मधुरता ही सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।

दक्षिण भारत में यही पर्व पोंगल के नाम से जाना जाता है। तमिलनाडु में सूर्य, धरती और पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का यह चार दिवसीय उत्सव श्रमशील जीवन का उत्सव है। उबलते पोंगल का दृश्य समृद्धि और उन्नति का प्रतीक माना जाता है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में संक्रांति, कर्नाटक में मकर संक्रामण और केरल में मकरविलक्कु के रूप में यह पर्व आस्था और परंपरा का संगम बन जाता है।

पूर्वी भारत में असम का माघ बिहू सामूहिकता और लोकसंस्कृति की सजीव अभिव्यक्ति है। सामूहिक भोज, लोकनृत्य और मेल-मिलाप सामाजिक एकता को मजबूत करते हैं। पश्चिम बंगाल में गंगा सागर मेला मकर संक्रांति की आध्यात्मिक ऊँचाई को दर्शाता है, जहाँ श्रद्धालु गंगा और सागर के संगम पर स्नान कर पुण्य की कामना करते हैं। उत्तराखंड में उत्तरायणी और घुघुतिया जैसे लोकपर्व बच्चों की किलकारियों, लोकगीतों और ग्रामीण सरलता से जीवन को रंग देते हैं।

इन सभी नामों, परंपराओं और रूपों के बीच जो एक तत्व समान है, वह है सूर्य के प्रति कृतज्ञता और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि। मकर संक्रांति हमें यह सिखाती है कि परिवर्तन से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उसका स्वागत करना चाहिए। जैसे सूर्य उत्तरायण होकर अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ता है, वैसे ही मनुष्य को भी अपने जीवन में निराशा, जड़ता और कटुता छोड़कर आगे बढ़ना चाहिए।

आज जब भारत आधुनिकता और तकनीक की ऊँचाइयों को छू रहा है, तब ऐसे पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। ये हमें याद दिलाते हैं कि हमारी शक्ति केवल आर्थिक या सैन्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक भी है। एक ही पर्व का इतने विविध रूपों में उत्सव मनाया जाना भारत की उस एकता का प्रमाण है, जो विविधता से जन्म लेती है।

मकर संक्रांति केवल तिथि नहीं, बल्कि चेतना है। यह हमें संयम, श्रम, सहअस्तित्व और सौहार्द का संदेश देती है। यही वह सूत्र है, जो लोहड़ी की अग्नि, पोंगल की मिठास, बिहू के नृत्य और पतंगों की उड़ान को एक ही भारत-भाव में बाँध देता है।

इस पावन अवसर पर देश के हर कोने में मकर संक्रांति, लोहड़ी, पोंगल, बिहू, उत्तरायणी और संक्रांति मनाने वाले सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ। सूर्य का यह उत्तरायण आपके जीवन में नई ऊर्जा, नई दिशा और नई संभावनाएँ लेकर आए — और “मेरा भारत महान” की भावना को और सशक्त बनाए।

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