मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 20-20 वर्ष के एक लिव-इन जोड़े को पुलिस संरक्षण प्रदान करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत अधिकारों का अस्तित्व होना और हर परिस्थिति में उनका प्रयोग करना दोनों अलग-अलग बातें हैं। जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकलपीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि यद्यपि वयस्क व्यक्तियों को अपनी इच्छा से रहने का अधिकार है, लेकिन कम उम्र में माता-पिता से अलग स्वतंत्र जीवन चुनने के गंभीर सामाजिक और आर्थिक परिणाम हो सकते हैं जिन पर युवाओं को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
अदालत ने व्यावहारिक पहलुओं को रेखांकित करते हुए कहा कि यदि युवा अपने माता-पिता पर निर्भर न रहकर स्वतंत्र रूप से रहने का निर्णय लेते हैं तो उन्हें स्वयं तथा अपने साथी की आजीविका की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है। इससे शिक्षा प्राप्त करने की संभावनाएँ अत्यधिक प्रभावित होती हैं और जीवन के अन्य अवसर सीमित हो जाते हैं। पीठ ने कहा कि भारत ऐसा देश नहीं है, जहाँ बेरोज़गार और अशिक्षित व्यक्तियों को राज्य की ओर से कोई भत्ता दिया जाता हो। ऐसे में कम उम्र में जीवन संघर्ष शुरू करने का निर्णय न केवल भविष्य के अवसरों को प्रभावित करता है, बल्कि समाज में स्वीकार्यता भी कम करता है।
राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि युवक की आयु मात्र 20 वर्ष होने के कारण वह विवाह के लिए विधिक रूप से सक्षम नहीं है, इसलिए पुलिस संरक्षण का कोई मामला नहीं बनता। यह भी कहा गया कि इस प्रकार का संरक्षण सामाजिक हित में नहीं होगा। हाईकोर्ट ने नंदकुमार निर्णय पर भरोसा करते हुए कहा कि 20 वर्ष का युवक विधिक रूप से वयस्क है और अपनी इच्छा से निवास करने का अधिकार रखता है। इस विकल्प को किसी बाहरी दबाव या हिंसा से सुरक्षित रखा जाना आवश्यक है।
इसके साथ ही न्यायालय ने युवाओं के निर्णयों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों को हर परिस्थिति में लागू करना अनिवार्य नहीं है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिकार होना और उसका प्रयोग करना दोनों में विवेक आवश्यक है। अंततः न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए संबंधित अधिकारियों को आवश्यक पुलिस संरक्षण प्रदान करने का निर्देश दिया और याचिकाकर्ताओं के वकील को यह भी निर्देश दिया कि वे न्यायालय द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं से याचिकाकर्ताओं को अवगत कराएँ।

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