• रवि उपाध्याय
कांग्रेस के सबसे बड़े और अपेक्षाकृत युवा नेता राहुल गांधी एक से अधिक बार केंद्र सरकार और भाजपा में आज के सबसे बड़े नेता नरेंद्र दामोदर दास मोदी पर डरपोक होने का बड़ा आरोप लगा चुके हैं। उनके अलावा कांग्रेस की दूसरी बड़ी नेता सांसद प्रियंका वाड्रा गांधी भी मोदी जी को कायर कह चुकीं हैं। यह आरोप जनता द्वारा चुनावों में निश्चयात्मक रूप से अस्वीकार हो चुके हैं।
हम भी उक्त आरोपों से सहमत नहीं हैं । लेकिन इन दिनों जो हालात हम अपने देश की पूरब दिशा में स्थित भारत के ही सरहदी राज्य पश्चिम बंगाल में और उसी प्रदेश से सटे या लगे बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ जिस तरह बर्बर और अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है वह परेशान ही करने वाला है। सारा देश इन दोनों जगह के हालातों से दुःखी और रोष में है। लेकिन जिस सरकार की जिम्मेदारी देश और उसके बाशिंदों की रक्षा करना है वो जब जुबानी जमा खर्च कर अपनी आँखें बंद कर ले, तो भले ही मन न माने लेकिन सोचने में आता है कि कहीं राहुल गांधी और उनकी बहन का कही बात सच तो नहीं है ? लेकिन चिंतन यह कहता है कि ऑपरेशन सिंदूर, सर्जिकल स्ट्राइक का निर्णय या आदेश देने वाली सरकार इतनी और ऐसी कमजोर नहीं हो सकती।
फिर क्या कारण है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस तरह से असंवैधानिक और संघीय व्यवस्था की भावना के खिलाफ अस्वीकार्य व्यवहार कर रहीं हैं उसके बावजूद मोदी सरकार आखिर कोई संवैधानिक कदम क्यों नहीं उठा रही हैं। तब मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक भी है कि क्या सरकार अक्षम है ? लेकिन मन यह मानने को तैयार नहीं हो रहा है ।
केंद्र की सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि संविधान महज़ एक ऐसी पुस्तक नहीं है जिसको सिर माथे पर लगाने भर से संवैधानिक शक्तियां आपके मन और शरीर में आ जाती हों। इसके लिए इसे विपरीत परिस्थितियां आने पर इसे पढ़ना और उसे लागू भी करना भी जरूरी होता है, ताकि किसी भी बद दिमाग़ व्यक्ति को स्वयं के अहंब्रह्मास्मी होने का गुमान ना हो सके। लेकिन इसके लिए दम यानि इच्छाशक्ति होना भी तो जरूरी है ना।
संविधान ने इसके लिए आपको अनुच्छेद 355 और 356 में यह शक्ति दे रखी है। जिसका कांग्रेस अपने शासन काल में 93 बार उपयोग कर राज्य सरकारों का बोरिया बिस्तर बंद कर उन्हें चलता कर चुकीं हैं। कांग्रेस के समेत संविधान लागू होने के बाद से अन्य गठबंधनों की सभी सरकारों द्वारा 132 बार राज्य की सरकारें भंग की जा चुकी हैं और किसी भी अदालत ने सरकार के उक्त कदमों को, एक आध अपवाद को छोड़ कर गलत नहीं ठहराया है।पश्चिम बंगाल में भी इस अनुच्छेद का उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा है, क्या इसका कारण अक्षमता है या बंगाल में चुनावी गणित ?
बता दें कि चुनाव तो जीते और हारे जा सकते हैं, परंतु कानून यदि परास्त हो जाता है तो उसके बाद अराजकता और तानाशाही का जन्म होता है। जिसे रोकना केंद्र की सरकार की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी होती है। सबसे पहले अनुच्छेद 356 को सन् 1956 में जम्मू कश्मीर में लागू किया गया था। उसके बाद इसे सन् 1958 में बिहार और 1959 में केरल में लागू कर वहां की सरकारों को बर्खास्त किया गया था।
केंद्र सरकार को पश्चिम बंगाल हो या बांग्लादेश दोनों समस्याओं को सख्ती से हल करना चाहिए। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री जिस तरह से निरंकुश व्यवहार कर रहीं हैं वह पूर्णतः अस्वीकार है। गत गुरुवार यानि 8 जनवरी को ममता बनर्जी ने जिस तरह प्रवर्तन निदेशालय की जांच टीम के साथ व्यवहार किया,उनके खिलाफ एफआईआर करवाई और अगले दिन हाईकोर्ट में इसी मामले की सुनवाई के दौरान उनके कार्यकर्ताओं ने हंगामा किया वह कानून व्यवस्था के लकवाग्रस्त होने का बड़ा सबूत है।
इसके पहले भी हाल ही में ममता बनर्जी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बंगाल दौरे पर यह टिप्पणी कर चुकीं हैं कि उनकी मेहरबानी है कि वे गृह मंत्री को उनके होटल से बाहर निकलने दे रहीं हैं। वह केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा समेत अनेक केंद्रीय मंत्रियों के कार्केट और भाजपा के स्थानीय नेताओं पर हमले करवा चुकी हैं। केंद्र सरकार को पश्चिम बंगाल में संविधान सम्मत कार्यवाही कर वहां राष्ट्रपति शासन लागू करना चाहिए।
यह तो पक्का है कि ममता बनर्जी के सीएम रहते हुए पश्चिम बंगाल में विधानसभा के चुनाव निष्पक्ष नहीं हो सकते। पिछला रिकॉर्ड भी यही बतलाता है।
उसी तरह बांग्लादेश में जिस तरह प्रति दिन हिंदुओं की नृशंस हत्याएं हो रही हैं उस दिशा में ठोस कार्रवाई होनी चाहिए केवल लव लेटर लिखने या गाल बजाने से समस्या का निराकरण नहीं हो सकता। इंदिरा गांधी और लालबहादुर शास्त्री जैसी दृढ़ता भी लानी होगी। मात्र गुजरात के केवड़िया में लौह पुरुष की दुनिया में सबसे ऊंची मूर्ति लगवाने से व्यक्ति ऊंचा नहीं होता उनसे प्रेरणा भी लेना होती है ।

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