कार्बन युग से हरित भविष्य की ओर भारत का बदलाव]भारत का हरित बदलाव: कानून, बाजार और जवाबदेही का संगम]
· प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
पर्यावरण संरक्षण को लेकर भारत ने जनवरी 2026 में ऐसा निर्णायक कदम उठाया, जिसने नीति और मानसिकता दोनों की दिशा बदल दी। अधिसूचित पर्यावरण संरक्षण कोष नियम केवल किसी कानून की औपचारिक घोषणा नहीं हैं, बल्कि उस पुराने टकरावपूर्ण दृष्टिकोण का अंत हैं जिसमें विकास को पर्यावरण का विरोधी मान लिया जाता था। अब प्रदूषण को नज़रअंदाज़ करने या मात्र दंड लगाकर औपचारिकता निभाने की नीति पीछे छूट रही है। भारत ने स्पष्ट और सख़्त संदेश दिया है कि जो पर्यावरण को क्षति पहुँचाएगा, उसे उसकी भरपाई भी करनी होगी। यह नई सोच पर्यावरणीय शासन को नैतिक दायित्व, ठोस जवाबदेही और वास्तविक प्रभावशीलता से जोड़ने का सशक्त प्रयास है।
अब तक पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन पर वसूली गई पेनल्टी प्रायः सरकारी खातों में निष्क्रिय पड़ी रह जाती थी। उसके उपयोग की दिशा स्पष्ट नहीं थी और पर्यावरण सुधार से उसका प्रत्यक्ष संबंध भी स्थापित नहीं हो पाता था। नए नियम इसी मूलभूत कमजोरी पर प्रहार करते हैं। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के अंतर्गत बने ये प्रावधान पेनल्टी के उपयोग को 11 स्पष्ट गतिविधियों से जोड़ते हैं। प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण और शमन से लेकर दूषित स्थलों के पुनर्विकास तक प्रत्येक पहल को ठोस वित्तीय समर्थन मिलता है। इस परिवर्तन ने पर्यावरणीय दंड को मात्र सज़ा नहीं, बल्कि सुधार की सशक्त प्रक्रिया में बदल दिया है।
इन नियमों के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण कोष को सार्वजनिक खाते में रखा जाएगा। इसके प्रभावी संचालन हेतु केंद्र और राज्यों के स्तर पर अलग-अलग परियोजना प्रबंधन इकाइयों का गठन किया गया है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की निगरानी व्यवस्था पारदर्शिता को संस्थागत रूप देती है। धन के दुरुपयोग की आशंका अब सैद्धांतिक बनकर रह जाती है। कुल राशि का 75 प्रतिशत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को देकर स्थानीय आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी गई है, जबकि शेष 25 प्रतिशत केंद्र के पास रहकर राष्ट्रीय निगरानी और नीति समन्वय को सुदृढ़ करेगा।
जन विश्वास अधिनियम 2023 ने इस कोष व्यवस्था को अतिरिक्त बल प्रदान किया है। अनेक पर्यावरणीय अपराधों को अपराधमुक्त कर मौद्रिक दंड में परिवर्तित किया गया, जिससे कानूनी प्रक्रिया अधिक सरल और व्यावहारिक बनी। अब अधिक मामलों में जुर्माना लगेगा और वही राशि सीधे पर्यावरण सुधार में व्यय होगी। इससे उद्योगों को स्पष्ट संकेत मिलता है कि उल्लंघन से बचना अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता है। यह व्यवस्था भय के स्थान पर जिम्मेदारी आधारित अनुपालन संस्कृति को प्रोत्साहित करती है, जो दीर्घकाल में कहीं अधिक प्रभावी सिद्ध होती है।
कार्बन-हैवी उद्योगों पर केंद्रित कठोरता इस नीति की सबसे निर्णायक विशेषता बनकर उभरती है। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता के लक्ष्य अब कुछ सीमित क्षेत्रों तक सिमटे नहीं रहे। सीमेंट, एल्युमीनियम, क्लोर-अल्कली और कागज उद्योग के साथ अब पेट्रोलियम रिफाइनरी, पेट्रोकेमिकल्स, वस्त्र और सेकेंडरी एल्युमीनियम भी इसके दायरे में हैं। चार सौ साठ से अधिक औद्योगिक इकाइयों पर लागू ये लक्ष्य प्रति टन उत्पादन उत्सर्जन को 3 से 7 प्रतिशत तक घटाने की अनिवार्यता स्थापित करते हैं।
अनुपालन में चूक पर लगाया जाने वाला पर्यावरणीय मुआवजा इस नीति को वास्तविक प्रभाव देता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा निर्धारित दंड उस वर्ष के औसत कार्बन क्रेडिट व्यापार मूल्य से दोगुना होगा। ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी द्वारा जारी कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र इस पूरी व्यवस्था की आधारशिला हैं। जो इकाइयाँ लक्ष्य से बेहतर प्रदर्शन करेंगी, वे अतिरिक्त क्रेडिट बेचकर आर्थिक लाभ अर्जित करेंगी। इस प्रकार प्रदूषण घाटे का सौदा बनता है और स्वच्छता लाभ का अवसर।
यह बाजार आधारित तंत्र उद्योगों को स्वच्छ प्रौद्योगिकी में निवेश की दिशा में मजबूती से प्रेरित करता है। ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा और कम-कार्बन प्रक्रियाएं अब केवल पर्यावरणीय जिम्मेदारी नहीं रहीं, बल्कि आर्थिक विवेक का प्रतीक बन गई हैं। जो उद्योग समय रहते बदलाव अपनाएंगे, वे प्रतिस्पर्धा में बढ़त हासिल करेंगे। जो पीछे रहेंगे, उन्हें दंड भुगतना पड़ेगा। इस तरह नीति बाध्यता के माध्यम से नवाचार को गति देती है और हरित संक्रमण को तेज करती है।
इन नियमों का सीधा और स्पष्ट संबंध भारत की अंतरराष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं से जुड़ता है। नेट-जीरो 2070 का लक्ष्य और 2030 तक उत्सर्जन तीव्रता में पैंतालीस प्रतिशत कमी की प्रतिज्ञा अब कागज़ी घोषणा नहीं रह गई है। सीमेंट में 3.4 प्रतिशत, एल्युमीनियम में 5.8 प्रतिशत और अन्य क्षेत्रों में 7 प्रतिशत तक निर्धारित लक्ष्य इस बदलाव को रेखांकित करते हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि विकास के नाम पर प्रदूषण की छूट का दौर अब समाप्त हो चुका है।
स्वाभाविक रूप से इन नियमों ने उद्योग और पर्यावरण के बीच बहस को और तीव्र कर दिया है। उद्योग जगत लागत बढ़ने, प्रतिस्पर्धात्मक दबाव और रोजगार पर संभावित प्रभावों की चिंता जता रहा है। वहीं पर्यावरणविद् जलवायु संकट की गंभीरता, जहरीली होती हवा और जनस्वास्थ्य पर बढ़ते खतरों को सामने रख रहे हैं। सरकार का स्पष्ट मत है कि यह टकराव नहीं, बल्कि संतुलन साधने का प्रयास है। स्वच्छ प्रौद्योगिकी अपनाने हेतु प्रोत्साहन, सब्सिडी और क्रेडिट ट्रेडिंग जैसे उपाय इस संक्रमण को व्यावहारिक और सुगम बनाएंगे।
राज्य स्तर पर उपलब्ध कराई जाने वाली 75 प्रतिशत राशि इस नीति को वास्तविक जमीनी शक्ति प्रदान करती है। इसके माध्यम से वायु गुणवत्ता सुधार, नदी सफाई, औद्योगिक क्लस्टरों की निगरानी और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रदूषण नियंत्रण की परियोजनाएं प्रभावी रूप से संचालित हो सकेंगी। स्थानीय समस्याओं के समाधान अब स्थानीय स्तर पर संभव होंगे। केंद्र द्वारा संचालित हिस्सा राष्ट्रीय डेटा, मानकों और तकनीकी क्षमता को सुदृढ़ करेगा। यह संघीय सहयोग का ऐसा ढांचा है जिसमें केंद्र दिशा निर्धारित करता है और राज्य क्रियान्वयन की शक्ति बनते हैं।
नए पर्यावरण पेनल्टी नियम जलवायु संघर्ष में भारत का अब तक का सबसे सशक्त हस्तक्षेप सिद्ध हो सकते हैं। यह नीति प्रदूषण करने वालों को जवाबदेह बनाकर प्रकृति को उसका अधिकार लौटाती है। उद्योगों के लिए उत्सर्जन घटाना अब केवल नैतिक आग्रह नहीं, बल्कि आर्थिक और कानूनी अनिवार्यता बन गया है। यदि इन नियमों का ईमानदार और कठोर क्रियान्वयन हुआ, तो भारत न केवल स्वच्छ पर्यावरण हासिल करेगा, बल्कि वैश्विक मंच पर नेतृत्व की भूमिका भी और मजबूत करेगा। यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित, संतुलित और सतत भविष्य की ठोस आधारशिला रखती है।

Post a Comment