अजय कुमार बियानी
इंजीनियर एवं स्वतंत्र लेखक
भारतीय संस्कृति का मूल तत्त्व पंचमहाभूतों की जीवन-व्यवस्था में निहित है—भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश। यही पंचतत्त्व भारतीय ज्ञान-संहिता की आत्मा हैं। जब कहा जाता है कि ‘‘भगवान’’ कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि प्रकृति और संस्कृति का संयमित योग है, तो यह बात हमें सनातन दृष्टि का वास्तविक अर्थ समझाती है। सनातन का अर्थ है—नित्य, अविनाशी, पुनर्जननशील और प्रवाहमान। भारत का जीवन जब इसी तत्त्वदर्शन से संचालित होता था, तब वह न केवल आर्थिक रूप से समृद्ध था, बल्कि सांस्कृतिक रूप से विश्व का मार्गदर्शक भी था।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के समय यह विचार और भी प्रासंगिक हो उठता है कि संघ का अस्तित्व मूलतः इसी सनातन जीवन-शैली के पुनरुत्थान का प्रयास है। संघ सरसंघचालक मोहन भागवत की दृष्टि इस मूल दर्शन की आधुनिक भाषा में व्याख्या है—भारत की पहचान धर्म से है, और धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन का वह संतुलित मार्ग है जिसमें प्रकृति, समाज, संस्कृति और आत्मा का योग हो। यह बात भारत की वैदिक चेतना को वर्तमान विश्व-यथार्थ में नया स्थान प्रदान करती है।
आज जब दुनिया युद्ध, आतंक, प्रतिस्पर्धा और पर्यावरण संकट से बोझिल हो चुकी है, तब यह प्रश्न अधिक गंभीर हो उठता है कि मनुष्य ने प्रकृति को संसाधन बनाकर क्यों देखा? पश्चिमी दृष्टि ने प्रकृति पर नियंत्रण को प्रगति माना, जबकि भारत ने उसे माता माना—पालनहार, पोषक, जीवन देने वाली शक्ति। यही अंतर आज की वैश्विक अव्यवस्था को जन्म देता है। मोहन भागवत का स्पष्ट कथन है कि भारत का मार्ग ‘‘सबका हित और सबके साथ’’ पर आधारित है, क्योंकि भारतीय समाज प्रकृति को जीवन का प्रथम गुरु मानता है।
भारतीय जीवन-दर्शन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संतुलन पर आधारित है, जहां मोक्ष का अर्थ त्याग या पलायन नहीं, बल्कि लालच से रहित आनंद है। संघ का जीवन-पथ इसी संतुलन को साधने की साधना है—व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व तभी स्वस्थ होंगे जब मानव प्रकृति के साथ समरस होकर जिएगा। राष्ट्रवाद को आज भौतिक शक्ति से मापा जा रहा है, जबकि मोहन भागवत इसे आध्यात्मिक स्वरूप में स्थापित करते हैं। उनके अनुसार राष्ट्र केवल भू-भाग नहीं, बल्कि स्मृति, संस्कृति, परंपरा और आस्था का जीवंत रूप है। भारत की शक्ति उसकी विविधता और सामंजस्य में है—यही सनातनता की पहचान है।
संघ की जीवन-प्रणाली में fr ग्राम-उन्नयन, पर्यावरण संरक्षण, जैविक खेती, नदी-पुनरुद्धार, जल-संरक्षण, हस्तशिल्प, स्वच्छता, नैतिक आहार-विहार, गौ-संवर्धन और लोकजीवन का पुनरुत्थान—ये सब आधुनिक रूप में भू-सांस्कृतिक मानचित्र की पुनर्स्थापना हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शासन व्यवस्था में इसी भारतीय दृष्टि को आधुनिक रूप दिया है। योग का विश्वदिवस, प्राचीन चिकित्सा पद्धति का पुनर्संयोजन, प्राकृतिक खेती का संवर्धन, सांस्कृतिक पुनर्जागरण, मंदिरों का पुनर्जीवन, ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की विश्व-दृष्टि, ‘‘लोकल से वैश्विक’’ का मार्ग, स्वावलंबन और प्रकृति-आधारित जीवन—यह सब दर्शाता है कि भारत का आध्यात्मिक विचार अब शासन और कूटनीति दोनों का आधार बन रहा है।
मोहन भागवत कई बार कहते हैं कि भारत विश्व का नेतृत्व किसी वर्चस्व से नहीं, बल्कि अपने धर्म से करेगा—और यहां धर्म का अर्थ है प्रकृति और संस्कृति के संतुलन का सिद्धांत। पश्चिम जहां विज्ञान को शक्ति का औजार बनाता है, वहीं सनातन दर्शन विज्ञान और अध्यात्म को पूरक मानता है। यही अंतर विश्व को दिशा देता है। भारत का समाधान प्रकृति-आधारित शिक्षा में है—जहां ज्ञान तकनीक भर न हो, बल्कि जीवन विद्या हो।
विश्व जिस संकट से गुजर रहा है—ग्लोबल वार्मिंग, मानसिक तनाव, अकेलापन, महामारी और युद्ध—उसका मूल कारण मानव और प्रकृति का विच्छेद है। संघ का कथन है कि मानव को मनुष्य बनाना ही राष्ट्र निर्माण है। शाखाओं में होने वाले प्राणायाम, सूर्यनमस्कार, योगासन, सामूहिक प्रार्थना—ये सब प्रकृति-संस्कृति-योग का अभ्यास हैं। ‘‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’’ केवल गीत नहीं, जीवन-दृष्टि का उद्घोष है।
भारत का मार्ग किसी पर थोपने का नहीं, बल्कि जगत को दिखाने का है कि शांति, संतोष और समृद्धि कैसे प्राप्त होती है। सनातन जीवन-पद्धति उपभोग नहीं, सहजीवन का मार्ग सिखाती है। संघ सरसंघचालक के कथन में स्पष्ट है कि मानवता का भविष्य प्रकृति और संस्कृति के समन्वय में है।
संघ का शताब्दी वर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह भारत के सनातन पुनरुत्थान का ऐतिहासिक क्षण बन सकता है। संघ का जीवन—साधारणता, संयम, समर्पण, सेवा, चरित्र, अनुशासन, आत्मपरिष्कार—प्रकृति आधारित संस्कृति की आधुनिक अभिव्यक्ति है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व इसी भारतीय दर्शन को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित कर रहा है।
आज जब संसार हिंसा और भय से भरा है, तब भारत का संदेश स्पष्ट है—समाधान हथियारों में नहीं, जीवन-दर्शन में है; विकास भौतिक उपभोग में नहीं, समरस संस्कृति में है; और भविष्य उसी सभ्यता का है जो प्रकृति को माता और संस्कृति को सृष्टि का धर्म मानकर चलती है।
सनातन जीवन-दृष्टि केवल विश्वास नहीं, बल्कि मानवता के लिए जीवंत प्रस्ताव है। मोहन भागवत का आग्रह है कि भारत को अपने अक्षय ज्ञान पर पुनर्विश्वास करना चाहिए, क्योंकि यही वह शक्ति है जो संकटग्रस्त विश्व को दिशा दे सकती है। जब प्रकृति और संस्कृति का योग जीवन का आधार बनेगा, तब व्यक्ति आरोग्यवान, समाज समृद्ध और राष्ट्र मोक्ष-पथ की ओर उन्मुख होगा। यही सनातन समृद्धि है और यही भारत का वैश्विक योगदान।

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