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हांडी का चांवल बनाम नमूना Rice from the pot versus the sample

रवि उपाध्याय 

हमारे देश में यह मान्यता है कि साधु,संत और योगी निस्पृह और निश्चल होते हैं। जब वे किसी पर कृपालु हो जाते हैं तो उन्हें अलग से आत्मीय संबोधन दे देते हैं। इसे उनके चेले - चांटे,और समर्थक बाबा का आशीर्वाद मान कर सिर माथे लगाते हैं। वहीं कुछ इससे रूठ जाते हैं। ऐसा ही कुछ इन दिनों लखनऊ में गोरखपुर वाले बाबा की टिप्पणी के बाद हो रहा है। योगी बाबा ने विधानसभा में कोडीन कफ सिरप से राज्य में मौतों के सवाल पर चल रही चर्चा के दौरान एक टिप्पणी की। योगी बाबा ने चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में नकली दवा से कोई मौत नहीं हुई। इसी पर चल रही चर्चा में उन्होंने बिना किसी का नाम लिए एक हल्की फुल्की टिप्पणी करते कहा कि देश में दो नमूने हैं एक दिल्ली में और एक लखनऊ में बैठते हैं। जब देश में कोई चर्चा होती है तो वे तुरंत देश छोड़ कर भाग जाते हैं।


योगी बाबा ने किसी व्यक्ति का नाम नहीं लिया था पर नेताजी ने उस टिप्पणी को अपने ऊपर मान लिया। 1959 में एक 

अनाड़ी फिल्म आई थी। इसमें नूतन ने पर्दे पर एक गाना गाया था.. वो चांद खिला वो तारे हंसे ये रात अजब मतवाली है, समझ ने वाले समझ गए ना समझे वो अनाड़ी हैं । पर भाई साहब नेता तो अनाड़ी होता नहीं है वह खुद को सबसे बड़ा विद्वान समझता है। इस पर सितम यह कि यदि नेता, नेता पुत्र हो तो वह भले ही नीम न हो, पर नीम चढ़ा जरूर हो जाता है। ऊपर से तुर्रा यह कि यदि वह फॉरेन ट्रेंड हो तो तुरंत ताड़ जाता है कि यह तीर उस पर ही छोड़ा गया है। तो तीर नेताजी के आर पार हो गया। उन्होंने तत्काल उसका जवाब दे डाला।

इस नोक झोंक से आनंदित छेदी बाबू ने हम से आ कर पूछा भाई साहब, उन्होंने अपने ऊपर क्यों ले लिया ? अरे चुप्पी साध जाते। बंद मुट्ठी लाख की खुल गई तो ख़ाक की। हमने कहा छेदी बाबू वो नेता ही क्या जो चुप्पी साध जाए । नेता जी की जुबान पर हर समय खुजली होती है जो कि बयान बन कर मौके ब मौके फटाक से बाहर कूद पड़ती है। दूसरी बात यह कि क्या आप यह समझते कि नेताओं में क्या आत्म बोध नहीं होता है। यही वही आत्म बोध था जिसने उन्हें रिएक्शन देने के भड़काया और वह बोल पड़े। छेदी बाबू बोले भाई साहब इससे तो दूसरा नेता समझदार निकला जो चुप्पी साध गया। वरना दुनिया समझ जाती कि अच्छा, तो यह है दूसरा नमूना। इससे यह भी साबित होता है कि कभी कभी चुप्पी साध लेना भी अच्छी बात होती है। इससे यह भी साबित होता है कि विदेश जा कर कुछ सीख तो मिलती ही है।

नमूना संबोधन वैसा ही अत्यंत आत्मीय और प्रेम का संबोधन है। जैसे चिंटू,पप्पू, अप्पू, चप्पू,टप्पू और गप्पू । वैसे बता दें कि नमूना वह होता है जो सबसे सर्वश्रेष्ठ और एक तरह से मुख्य प्रतिनिधि चेहरा होता है।अंग्रेजी में इसे सैंपल कहा जाता है। दूसरे नमूना, हांडी का वाह चांवल होता है जिससे हांडी में मौजूद भात के पकने का अंदाज लगाया जा सकता है। सियासी दल या पार्टी को यदि हांडी मान लिया जाए तो नेता उसका चांवल है जिससे देख सुन कर पार्टी की नीति व नीयत का अंदाज लगाया जा सकता है। वह पार्टी का मुखड़ा या कहिए मुखौटा होता है। उसके बोलचाल रहन - सहन चाल - ढाल से अंदाज लगाया जा सकता है कि पार्टी सीरत कैसी होगी। आज कल न्यूज चैनलों पर यह काम प्रवक्ता कर रहे हैं। उनकी बौद्धिकता का अंदाज उनके व्यवहार और चैनलों पर प्रजेंटेशन से लग जाता है कि उनका नेता भी कितना चूज़ी और इंटेलिजेंट होगा जिसने इस चूज़े को चूज़ किया है।

आपको बता दें कि अतीत में राजशाही के जमाने में एक राज्य से दूसरे राज्य में दूत भेजे जाते थे। वह उस देश के प्रभाव का दर्पण होता है। उस राज्य का नमूना यानि प्रतिनिधि होता है । उससे पता चल जाता था कि उस राज्य का राजा कितना बुद्धिमान और पराक्रमी है। इसका उदाहरण हैं रामभक्त केसरी नंदन हनुमान जी। जिन्होंने लंका में जा कर दशानन को बता दिया था कि उनके प्रभु श्री राम कैसे पराक्रमी हैं और वे क्या चाहते हैं। जब राम दूत का रावण के भरे दरबार में अपमान किया गया तो उन्होंने इसका उचित उत्तर भी दिया। 

लेकिन अब राजशाही खत्म हो चुकीं हैं। अब हमारे देश में लोकतंत्र शब्द के अर्थ अपने अपने ढंग से निकाले जाने लगे हैं। ऐसा ही शब्द नमूना के साथ हुआ है नेता इसका बुरा मान गए। बुरा माने भी क्यों नहीं क्योंकि वे असलियत से वाक़िफ जो ठहरे। दूसरा व्यक्ति समझ ही नहीं सका कि क्या हो गया। उनके भाष्यकारों की हिम्मत ही नहीं हुई कि उन्हें नमूना की व्याख्या कर बता सकें कि उसका सही मतलब क्या है। क्योंकि असलियत बता कर आ बैल मुझे मार आखिर कौन करे।

 ( लेखक एक व्यंग्यकार और राजनैतिक समीक्षक हैं। )

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